अहरौरा की अनोखी आस्था जब हर तीसरे साल मायके से ससुराल लौटती हैं मां भंडारी देवी
मिर्ज़ापुर : आस्था की एक ऐसी अनूठी तस्वीर, जो दिल को छू ले और विश्वास को गहरा कर दे ! मिर्जापुर के अहरौरा में मां भंडारी देवी के मायके से ससुराल लौटने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जा रही है। हर तीसरे साल अहरौरा के लोग अपनी कुलदेवी को डोली में बिठाकर विदा
कराने राजा बाबा के पहाड़ पर पहुंचते हैं। लहलहाती फसलें हों या पथरीले रास्ते, भक्ति के आगे हर रुकावट छोटी पड़ जाती है। यह महज एक पहाड़ नहीं, बल्कि मां भंडारी देवी का मायका है। माहौल में शंखनाद है, हर तरफ जयकारे गूंज रहे हैं और हजारों आँखें भक्ति के आंसुओं से नम हैं। मान्यता है कि हर तीसरे साल माता रानी अपने भाई राजा बाबा के घर आती हैं और आज अहरौरा का हर नागरिक, हर महिला, हर बुजुर्ग एक बेटी की विदाई कराने यहाँ पहुँचा है। खेतों में फसलें खड़ी हैं, रास्ता कठिन है,
लेकिन माता रानी के इस डोला-खटोला को उठाने के लिए कंधों की कोई कमी नहीं है। इस यात्रा की असली ताकत वो श्रद्धालु हैं जो घंटों पैदल चलकर, डोला अपने कंधों पर उठाकर माता को विदा कराने आए हैं। लोकमान्यता यह भी है कि माता रानी का डोला जिस खेत, जिस रास्ते से गुजरता है, वहाँ कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती। किसान खुशी-खुशी अपने खेतों से रास्ता देते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि माता रानी के कदम पड़ते ही उनकी भूमि धन्य हो जाती है। बेटी की विदाई का दर्द और मां के लौटने की खुशी-यह अद्भुत संगम सिर्फ अहरौरा की इस पावन धरती पर ही देखने को मिल सकता है। आस्था, संस्कृति और अटूट विश्वास की यह गाथा सदियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही जीवंत है। आज सुबह से ही थानाध्यक्ष अजय मिश्रा मय पुलिस पीएसी फोर्स के साथ डोला के साथ-साथ चलते रहे। वही सीयूर से दोपहर दो बजे मां के डोला के साथ पुलिस फोर्स भण्डारी देवी के लिए रवाना ही गए। इस सुरक्षा व्यवस्था में अहरौरा थाना सहित आस पास के कई थानों के थाना प्रभारी मौजूद रहे।
रिपोर्टर : अनिल केशरी
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