15 दिन भी नहीं टिक पाया 2 करोड़ का पुल! मिर्जापुर जनता के साथ बड़ा धोखा!

मिर्जापुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने सिस्टम के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। जिस पुल का उद्घाटन अभी 15 दिन पहले बड़े तामझाम और नारों के साथ हुआ था, वो पुल आज गंगा की एक लहर भी नहीं सह सका! करोड़ों की लागत, वीआईपी उद्घाटन और जनता की उम्मीदें...सब कुछ पानी में मिल गया। क्या यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा है या फिर भ्रष्टाचार का बहता हुआ नमूना? आइए जानते हैं इस महा-लापरवाही की पूरी कहानी!

मिर्जापुर के मझवां विधानसभा क्षेत्र में नेवढ़िया घाट से गेगराव घाट को जोड़ने वाला नवनिर्मित प्लाटून (पीपा) पुल ताश के पत्तों की तरह बिखर गया है। आपको बता दें कि इस पुल का सपना क्षेत्र की जनता ने लंबे समय से देखा था, जिसे पूरा करने के लिए स्थानीय बीजेपी विधायक सुचिस्मिता मौर्या ने बीते 21 मार्च को बड़े धूमधाम से इसका उद्घाटन किया था।
लेकिन विकास की यह चमक महज 15 दिन में ही फीकी पड़ गई। पुल के टूटते ही इलाके का संपर्क कट गया है और करोड़ों की लागत से बना यह प्रोजेक्ट अब सवालों के घेरे में है। जब इस मामले पर PWD विभाग की घेराबंदी की गई, तो अधिकारी अपनी सफाई के साथ तैयार थे। PWD अधिकारी वीके पाण्डेय का कहना है कि:

"गंगा में अचानक जलस्तर बढ़ गया और साथ ही तेज आंधी आई। इसी दबाव के कारण पुल के पीपे (प्लाटून) अपनी जगह से खिसक गए। यह कोई स्ट्रक्चरल फेलियर नहीं बल्कि प्राकृतिक वजहों से हुआ है।"

विभाग का दावा है कि मरम्मत का काम युद्ध स्तर पर जारी है और मात्र दो घंटे के भीतर पुल को दोबारा चालू कर दिया जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ₹2 करोड़ से ज्यादा की लागत वाला पुल एक सामान्य आंधी और जलस्तर बढ़ने की चेतावनी भी नहीं झेल सकता था?

मौके पर मौजूद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है। राहगीर मोहित ने बताया कि वह अपने गंतव्य के लिए निकले थे, लेकिन यहां आकर पता चला कि रास्ता ही खत्म हो चुका है। अब उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। वहीं अवधेश नाम के स्थानीय निवासी ने सीधे तौर पर सिस्टम को घेरा। उन्होंने कहा कि आंधी और पानी का बहाना बनाया जा रहा है, जबकि असलियत जनता के सामने है कि पुल कितनी मजबूती से बनाया गया था। हैरानी की बात तो यह है कि यह मिर्जापुर में पिछले तीन दिनों के भीतर दूसरा बड़ा हादसा है! इससे पहले विंध्याचल और हरसिंगपुर को जोड़ने वाला प्लाटून पुल भी उद्घाटन के 15 दिनों के भीतर ही क्षतिग्रस्त हो गया था। एक के बाद एक दो पुलों का टूटना PWD विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगाता है।

इस पुल के निर्माण में 2 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई थी। जनता का टैक्स का पैसा पानी में बह रहा है और प्रशासन इसे 'सामान्य घटना' बता रहा है। फिलहाल मौके पर मरम्मत का काम चल रहा है और प्रशासन का दावा है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे। लेकिन सवाल वही है क्या हर बार पुल टूटने के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी?

मिर्जापुर की यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि जल्दबाजी में किए गए उद्घाटन और ठेकेदारी की गुणवत्ता में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक है। एक तरफ जनता को सुगम रास्ते का लालच दिया गया, तो दूसरी तरफ चंद दिनों में ही उन्हें मजधार में छोड़ दिया गया। अब देखना यह होगा कि क्या PWD के बड़े अधिकारियों और जिम्मेदार ठेकेदारों पर कोई गाज गिरती है, या फिर 'आंधी और पानी' का बहाना बनाकर इस फाइल को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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