मनरेगा में बदलाव: सुधार या ग्रामीण सुरक्षा पर सवाल?

ग्रामीण भारत की रीढ़ मानी जाने वाली योजना मनरेगा (MGNREGA) एक बार फिर चर्चा में है। केंद्र सरकार द्वारा हाल में प्रस्तावित बदलावों को सरकार “पारदर्शिता और बेहतर कार्यान्वयन” से जोड़कर देख रही है, जबकि विपक्ष और सामाजिक संगठनों को इससे योजना की मूल भावना कमजोर होने का डर है। सरकार का तर्क है कि तकनीक आधारित निगरानी और संरचनात्मक सुधारों से फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी और वास्तविक लाभार्थियों को ज़्यादा फायदा मिलेगा। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि बजटीय दबाव, राज्यों पर बढ़ता वित्तीय बोझ और भुगतान में देरी जैसे मुद्दे पहले से ही मनरेगा को प्रभावित कर रहे हैं। डाउन टू अर्थ और बिज़नेस स्टैंडर्ड जैसी रिपोर्टों के अनुसार, कई राज्यों में काम की मांग और समय पर मजदूरी भुगतान एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। राजनीतिक रूप से यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि मनरेगा सीधे तौर पर ग्रामीण रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है। आने वाले समय में यह बहस तय करेगी कि मनरेगा एक मजबूत अधिकार-आधारित योजना बनी रहती है या केवल एक सीमित सरकारी कार्यक्रम बनकर रह जाती है।

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