जंतर-मंतर के 'लंगर वाले जुनैद' ने लगाए सनसनीखेज आरोप!

जंतर-मंतर का ऐतिहासिक छात्र आंदोलन खत्म हो चुका है...शिक्षा मंत्री की कुर्सी जा चुकी है...प्रदर्शनकारी अपने-अपने घर लौट चुके हैं...लेकिन इस आंदोलन का एक ऐसा चेहरा अब सबसे बड़ी बहस बन गया है...जिसने मंच से भाषण नहीं दिया...जिसने कोई राजनीतिक नारा नहीं लगाया...जिसने कैमरों के सामने खुद को नेता साबित करने की कोशिश नहीं की...बल्कि 35 दिनों तक हजारों प्रदर्शनकारियों के लिए चाय बनाई...पानी पिलाया...खाना खिलाया...और लोगों की सेवा करता रहा। लेकिन अब वही शख्स दावा कर रहा है कि उसे इस सेवा की कीमत चुकानी पड़ी...उसका आरोप है कि उसे अस्पताल से लौटते वक्त उठा लिया गया...घंटों तक आंखों पर पट्टी बांधकर रखा गया...उससे सिर्फ एक सवाल पूछा जाता रहा कि आखिर इतना खाना आ कहां से रहा था...पैसा कौन दे रहा था...फंडिंग कौन कर रहा था...? जी हां हम बात कर रहे हैं....मोहम्मद जुनैद मालिक! वही जुनैद, जो कड़कती धूप और भीषण गर्मी में जंतर-मंतर पर डटे छात्रों के लिए कभी ठंडा पानी, कभी चाय, तो कभी ब्रेड-पकौड़े और खाना लेकर पहुंच जाते थे। 35 दिनों तक आंदोलनकारियों के पेट की आग बुझाने वाला यह शख्स, आज खुद आंसुओं के समंदर में डूबा हुआ है। लेकिन सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक सेवादार अचानक पुलिस के रडार पर आ गया? क्यों एक आम छात्र नेता को रातों-रात उठाकर ले जाया गया? और क्यों उसके पूरे परिवार को इस विवाद में घसीट लिया गया? आइए, जानते हैं इस पूरे मामले की अंदर की कहानी! 

गाजियाबाद जिले के मसूरी थाना क्षेत्र के नाहल गांव से आने वाले मोहम्मद जुनैद मालिक एक बेहद साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। आठ भाई-बहनों में पली-बढ़ी इस शख्सियत ने गाजियाबाद के शंभु दयाल कॉलेज और फिर सुंदर दीप कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी से पढ़ाई की। पिछले साल ही एलएलबी पूरी कर वकील बने जुनैद, ज्यूडिशियरी और बाकी सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे थे। छात्र राजनीति से लेकर सीएए विरोध, 2021 के किसान आंदोलन और वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ प्रदर्शनों तक, जुनैद हमेशा सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहे हैं। दरअसल, बात 20 जून की है। जुनैद एक सरकारी नौकरी की परीक्षा देकर दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे। वहां कॉकरोच जनता पार्टी और छात्रों का प्रदर्शन चल रहा था। जून की झुलसाने वाली गर्मी में जब उन्होंने देखा कि वहां पीने का पानी तक नसीब नहीं हो रहा है, तो उनका दिल पसीज गया। बस, वहीं से शुरू हुआ सेवा का सिलसिला! जुनैद ने अपने साथी बृजेश पांडे के साथ मिलकर पहले पानी की रेहड़ी लगाई। धीरे-धीरे चाय, बिस्कुट, नमकीन और फिर लंगर का इंतज़ाम होने लगा। जुनैद बिना थके, 24 घंटे जंतर-मंतर पर डटे रहते थे। CJP के मुखिया अभिजीत दिपके से लेकर भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक तक, जुनैद हर किसी के साथ साए की तरह खड़े रहे। 

अभिजीत दिपके भी उनके साथ बैठकर खाना खाते थे और हक से कहते थे कि "जुनैद भाई! सबके खाने-पीने का इंतजाम कर दो...जुनैद भाई, आपको कुछ हो गया तो हमें खाना कौन खिलाएगा?" वहीं जैसे-जैसे जंतर-मंतर पर खाने-पीने का दायरा बढ़ता गया, वैसे-वैसे सोशल मीडिया पर सवाल तैरने लगे कि "आखिर इतने बड़े लंगर के लिए पैसा आ कहां से रहा है? कौन कर रहा है इस आंदोलन की फंडिंग?" हालांकि जुनैद का साफ़ कहना था कि उन्होंने कभी किसी से एक रुपया नकद या ऑनलाइन चंदा नहीं लिया। जो भी आता, अपनी तरफ से पानी की बोतलें, बिस्कुट या 20-40 थाली खाना पैक करवाकर दे जाता। सिख भाई आए, गुरुद्वारों से लंगर आया, मंदिरों से खाना आया, किसान संगठनों ने मदद की और CJP के डोनेशन बॉक्स से भी सहयोग मिला। लेकिन आरोपों के मुताबिक, प्रशासन को यह बात खटक गई और फिर आई 24 जुलाई की वो खौफनाक रात!

जुनैद के मुताबिक, उस रात उन्हें जंतर-मंतर पर एक आवारा कुत्ते ने काट लिया था। वे अपने साथी के साथ राम मनोहर लोहिया अस्पताल से रैबीज का टीका लगवाकर बाहर निकले और ऑटो में बैठे। मुश्किल से 50-60 मीटर ही आगे बढ़े होंगे कि सामने से बिना नंबर प्लेट की एक सफेद स्कॉर्पियो आई। बिल्कुल किसी एक्शन फिल्म के सीन की तरह! गाड़ी से उतरे लोग ऑटो में घुसे, जुनैद और उनके साथी को बीच में दबोच लिया। घबराए जुनैद ने जब पूछा तो उन्होंने खुद को दिल्ली पुलिस बताया, हालांकि चेहरे ढके हुए थे। इसके बाद दोनों की आंखों पर काली पट्टी बांध दी गई और स्कॉर्पियो फर्राटा भरने लगी। जुनैद का दावा है कि उन्हें किसी अज्ञात इमारत की दूसरी मंजिल पर ले जाया गया। पूरी रात आंखों पर पट्टी बंधी रही। अगले दिन, यानी 25 जुलाई की सुबह करीब 11:30 बजे एक सीनियर अफसर आया। सवाल वही थे...

खाना कहां से ला रहे थे?
पैसा कौन दे रहा था?
किसके इशारे पर यह सब चल रहा था?

जुनैद ने शांत होकर जवाब दिया कि यह सब लोगों का आपसी सहयोग था। जवाब से संतुष्ट होने के बाद अफसर ने उन्हें छोड़ने का हुक्म दिया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई! फिर से आंखों पर पट्टी बांधी गई और करीब 5-6 घंटे तक गाड़ी लगातार चलती रही। शाम को करीब 6 बजे जब उन्हें उतारा गया और पट्टी खोली गई, तो जुनैद के होश उड़ गए! सामने न दिल्ली थी, न गाजियाबाद...चारों तरफ सिर्फ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ थे! स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला कि उन्हें उत्तराखंड के मसूरी में छोड़ दिया गया है! वहां से वे जैसे-तैसे शनिवार को कैब करके वापस दिल्ली पहुंचे। हालांकि, जुनैद ने यह साफ़ किया कि पुलिस ने उनके साथ कोई मारपीट या बदसलूकी नहीं की, उन्हें खाना-पानी दिया और ठीक से पेश आई। लेकिन आपको बता दें आंदोलन की आंच सिर्फ जुनैद तक सीमित नहीं रही, उनके पूरे परिवार को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। 

जुनैद का आरोप है कि 23 जुलाई की शाम जब उनके बुजुर्ग पिता मुस्तफा घर पर खाना खा रहे थे, तभी गाजियाबाद पुलिस उन्हें उठाकर मसूरी थाने ले गई और देर रात छोड़ा। अगले दिन यानी 24 जुलाई की सुबह 9 बजे उन्हें फिर से उठा लिया गया। हद तो तब हो गई जब मेरठ में रहने वाली जुनैद की बहन के घर भी पुलिस पहुंच गई और उनके ससुर व देवर को थाने में ले जाकर बैठा दिया। जुनैद का दावा है कि पुलिस उनके घर से बैंक पासबुक, आधार कार्ड और अन्य जरूरी कागजात अपने कब्जे में ले गई। पुलिस की शर्त थी कि "जुनैद थाने आएगा, तभी परिवार को छोड़ेंगे।" वहीं इस पूरे घटनाक्रम पर गाजियाबाद पुलिस का रुख बिल्कुल अलग है।

गाजियाबाद ग्रामीण के DCP सुरेंद्र नाग तिवारी ने साफ कहा कि जुनैद के पिता को किसी गिरफ्तारी के तहत नहीं, बल्कि एक सामान्य जांच के सिलसिले में पूछताछ के लिए मसूरी थाने बुलाया गया था। पूछताछ खत्म होते ही उन्हें सम्मानपूर्वक घर भेज दिया गया था। वहीं जुनैद के पिता मुस्तफा ने भी बाद में एक वीडियो जारी कर पुष्टि की कि पुलिस ने उनसे सिर्फ पूछताछ की थी और फिर घर छोड़ दिया था। 

दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस जंतर-मंतर पर बांटे गए भोजन के रैपर्स, पैकेजिंग और कैटरर्स के जरिए यह पता लगाने में जुटी है कि इस भारी मात्रा में सप्लाई किए जा रहे खाने के पीछे कौन-कौन से रेस्टोरेंट्स और सप्लायर्स शामिल थे। वहीं इस घटना के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है! कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने सरकार और पुलिस पर करारा हमला बोलते हुए कहा कि जो शख्स महीनों से बिना स्वार्थ के लोगों की सेवा में लगा था, उसे जिस तरह से डिटेन किया गया, वह बेहद हैरतअंगेज और निंदनीय है। 

CJP ने सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर पुलिसिया कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की और जुनैद को पूरा कानूनी बैकअप देने का ऐलान किया। साथ ही AISA और अन्य छात्र संगठनों ने इसे असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश करार दिया।

आपको बता दें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही आंदोलन अपनी मंजिल तक पहुंच गया। जंतर-मंतर पर ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मन रहा था, पटाखे फूट रहे थे...लेकिन उस ऐतिहासिक पल में, आंदोलन की रीढ़ कहे जाने वाले जुनैद वहां मौजूद नहीं थे। जब वे वापस लौटे, तो आंदोलन खत्म हो चुका था। साथी अपने-अपने घर लौट चुके थे। कैमरे के सामने जब इस जीत का जिक्र हुआ, तो जुनैद अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए और फफक-फफक कर रो पड़े। वहीं 
अब सवाल यह उठता है कि क्या एक छात्र आंदोलन में सेवादार की भूमिका निभाना इतना बड़ा अपराध बन गया? एक तरफ जुनैद के आंसू और उनके गंभीर आरोप हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस की अपनी दलीलें। फिलहाल मामला अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है और इस पर सियासी व सामाजिक पारा अपने चरम पर है! 

देखा जाए तो कहानी सिर्फ मोहम्मद जुनैद की नहीं है...कहानी उस आंदोलन की भी है...जहां हजारों लोग एक मकसद के लिए जुटे...कई चेहरे नेता बने...कई चेहरे सुर्खियां बटोरकर चले गए...लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मंच नहीं संभाला...माइक नहीं पकड़ा...बल्कि चुपचाप लोगों की सेवा करते रहे। अब उन्हीं मोहम्मद जुनैद मालिक के आरोपों ने एक नई बहस खड़ी कर दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह मामला सिर्फ पूछताछ तक सीमित था, या फिर आरोपों में दम है? इसका फैसला जांच और सबूतों के आधार पर ही सामने आएगा। फिलहाल आगे इस मामले में क्या कानूनी मोड़ आता है, ये देखना दिलचस्प होगा। 

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