कांग्रेस ने मांगा सीएम मोहन यादव का इस्तीफा, अखिलेश यादव ने क्यों किया बचाव?

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव इस वक्त चौतरफा हमलों और विवादों के चक्रव्यूह में घिर चुके हैं। उज्जैन की पवित्र धरती पर एक ऐसा जमीन का बवंडर उठा है, जिसे कांग्रेस ने सीधे-सीधे महाकाल की जमीन की लूट का नाम दे दिया है! विपक्ष का आरोप है कि सीएम के कुनबे ने पद का फायदा उठाकर करोड़ों की जमीनें दबा ली हैं और इसके बाद मोहन यादव के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है। लेकिन ठहरिए! कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब इस पूरे सियासी ड्रामे में उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की एंट्री होती है। अखिलेश यादव ने मोहन यादव का बचाव करते हुए एक ऐसा बम फोड़ दिया है, जिसकी गूंज से दिल्ली से लेकर लखनऊ तक का बीजेपी दफ्तर हिल गया है! जी हां अखिलेश ने साफ कह दिया है कि यह कोई घोटाला नहीं, बल्कि बीजेपी के अंदर ही चल रही कुर्सी छिनो गैंग की एक बहुत बड़ी साजिश है! आइए आपको बताते हैं इस जमीन विवाद, मोहन यादव के 23 साल पुराने राजनीतिक किस्से और अखिलेश के इस दावों की पूरी इनसाइड स्टोरी!

दरअसल, सारा बखेड़ा शुरू हुआ एक मीडिया रिपोर्ट के सामने आने के बाद। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दिसंबर 2023 में जैसे ही डॉ. मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, वैसे ही उनके परिजनों, करीबियों और उनसे जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने उज्जैन में अंधाधुंध जमीनों की खरीदारी शुरू कर दी। दावा है कि देखते ही देखते इन लोगों ने करीब 168 एकड़ जमीन के 137 भूखंड अपने नाम करवा लिए, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 45 करोड़ रुपये बताई जा रही है। अब इसमें सबसे बड़ा झोल यह बताया जा रहा है कि यह सारी जमीनें उन्हीं इलाकों में खरीदी गई हैं, जहां भविष्य में इंदौर-उज्जैन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर, बड़े रोड प्रोजेक्ट्स, मास्टर प्लान के तहत लैंड यूज़ में बदलाव और 2028 में होने वाले सिंहस्थ महापर्व से जुड़े विकास कार्य होने वाले हैं! विपक्ष का कहना है कि मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए पहले ही कौड़ियों के भाव जमीनें खरीद ली गईं ताकि सरकारी प्रोजेक्ट आते ही इनकी कीमतें आसमान छूने लगें और करोड़ों का मुनाफा कमाया जा सके। वहीं जैसे ही यह खबर बाहर आई, कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे लूट की सरकार और कुर्सी की आपसी लड़ाई का नतीजा बताया। वहीं, एमपी कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज से इस पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने की मांग ठोक दी। सुप्रिया श्रीनेत और तृणमूल कांग्रेस की सागरिका घोष ने भी इसे एक महाघोटाला करार दिया। 

वहीं मामला बढ़ता देख मुख्यमंत्री कार्यालय तुरंत एक्शन में आया और एक बड़ी सफाई जारी की। सरकार की तरफ से इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा गया कि जब से मोहन यादव ने सीएम पद संभाला है, तब से न तो उन्होंने, न उनकी पत्नी सीमा यादव ने और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य ने कोई नई जमीन खरीदी है। ये सारे आरोप झूठे और राजनीति से प्रेरित हैं। वहीं इस पूरे विवाद के बीच यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जब अपनी जुबान खोली, तो उन्होंने अपनी ही सहयोगी कांग्रेस से अलग स्टैंड ले लिया और मोहन यादव के बचाव में उतर आए। अखिलेश यादव ने पत्रकारों से बात करते हुए सीधे बीजेपी आलाकमान पर तीर छोड़ दिए। अखिलेश ने कहा कि मोहन यादव को बदनाम करने के लिए यह पूरा ताना-बाना खुद बीजेपी के अंदर के लोगों ने बुना है। अखिलेश यहीं नहीं रुके, उन्होंने एक और सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि अगर मोहन यादव पर 168 एकड़ के आरोप लग रहे हैं, तो उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री ने भी 300 से 600 एकड़ जमीन हासिल की है। हालांकि, अखिलेश ने अपने इस दावे के पक्ष में कोई लिखित सबूत पेश नहीं किया।

आपको बता दें इस जमीन विवाद के बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव का साल 2003 का एक दिलचस्प और पुराना राजनीतिक किस्सा भी गलियारों में तैरने लगा है। यह बात तब की है जब मध्य प्रदेश में 2003 के विधानसभा चुनाव होने वाले थे। बीजेपी ने उज्जैन जिले की बड़नगर सीट से मोहन यादव को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। लेकिन जैसे ही उनके नाम का ऐलान हुआ, वहां के तत्कालीन बीजेपी विधायक शांतिलाल धाबी के समर्थक भड़क गए और सड़कों पर उतर आए। उनके लिए मोहन यादव एक बाहरी उम्मीदवार थे। विरोध इतना तगड़ा था कि बीजेपी को मजबूरन मोहन यादव से अपना टिकट वापस लेना पड़ा और दोबारा शांतिलाल धाबी को ही मैदान में उतारना पड़ा, जो बाद में चुनाव जीत भी गए। कहा जाता है कि मोहन यादव ने खुद बड़े दिल का परिचय देते हुए पार्टी लीडरशिप से अपना टिकट वापस करने की बात कही थी। इसके बाद उन्होंने उज्जैन दक्षिण सीट का रुख किया और वहां कांग्रेस के कद्दावर नेता जयसिंह दरबार को 10 हजार वोटों से पटखनी दे दी। 1984 में ABVP और RSS से अपने सफर की शुरुआत करने वाले मोहन यादव इसके बाद लगातार 2013 से उज्जैन दक्षिण से जीतते आ रहे हैं और पिछले चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के चेतन यादव को करीब 13 हजार वोटों से हराकर तीसरी बार विधायकी जीती और आज वो सूबे के मुखिया हैं।

फिलहाल उज्जैन की जमीन से उठा यह सियासी बवंडर अब मध्य प्रदेश की सरहदें लांघकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी बारूद की तरह फैल चुका है। एक तरफ जहां कांग्रेस इसे महाकाल की जमीन की लूट बताकर मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांग रही है, वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव के इस दावे ने कि 'यह यूपी के मुख्यमंत्री को हटाने की बीजेपी की अंदरूनी साजिश है', पूरी बहस को एक नया ही मोड़ दे दिया है। ऐसे में अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से आने वाला ये आधिकारिक बयान इन आरोपों की कितनी हवा निकाल पाता है, और कांग्रेस जो इस मुद्दे पर आक्रामक है, वो आगे क्या कदम उठाती है। लेकिन एक बात तो साफ है, इस जमीन के सौदे ने बीजेपी के भीतर और बाहर की सियासत को पूरी तरह गर्मा दिया है! 

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