530 वोट से 16 हजार की जीत तक! मोहनलालगंज में कैसे बदली सियासत?
लखनऊ की सियासत में एक ऐसी विधानसभा सीट, जहां कभी समाजवादी पार्टी का दबदबा दिखाई दिया, जहां 2017 में जीत और हार के बीच सिर्फ 530 वोटों का फासला रह गया, लेकिन अगले ही विधानसभा चुनाव में ऐसी सियासी करवट आई कि भारतीय जनता पार्टी ने सीट पर कब्जा जमा लिया! जी हां, हम बात कर रहे हैं लखनऊ जिले की मोहनलालगंज विधानसभा सीट की। एक ऐसी सीट, जहां 2012 में समाजवादी पार्टी ने जीत का परचम लहराया, 2017 में भी सपा ने अपनी सीट बचा ली, लेकिन इस बार जीत इतनी मामूली थी कि महज 530 वोटों ने उम्मीदवार की किस्मत का फैसला कर दिया। और फिर आया 2022 का विधानसभा चुनाव, जब बीजेपी ने न सिर्फ सपा के विजय रथ को रोक दिया, बल्कि 16 हजार 548 वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल कर ली। अब सवाल है कि आखिर मोहनलालगंज में ऐसा क्या बदला? जिस सीट पर समाजवादी पार्टी लगातार दो चुनाव जीत रही थी, वहां बीजेपी ने तीसरे चुनाव में बाजी कैसे पलट दी? क्या 2017 का बेहद करीबी मुकाबला आने वाले बदलाव का संकेत था? या 2022 में मतदाताओं के सामने मुद्दे और चुनावी परिस्थितियां कुछ अलग थीं? तो चलिए, शुरुआत करते हैं मोहनलालगंज विधानसभा सीट की बुनियादी जानकारी से और फिर एक-एक करके खोलते हैं 2012, 2017 और 2022 के चुनावी नतीजों की पूरी कहानी।
लखनऊ जिले की मोहनलालगंज विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण आरक्षित सीटों में गिनी जाती है। यह विधानसभा क्षेत्र संख्या 176 है और अनुसूचित जाति यानी एससी वर्ग के लिए आरक्षित है। यह मोहनलालगंज लोकसभा क्षेत्र का भी हिस्सा है। मोहनलालगंज की राजनीति को समझने के लिए यहां के चुनावी नतीजों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों की जरूरतों और लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों को समझना भी जरूरी है। किसानों को खेती के लिए पानी और दूसरी सुविधाएं कितनी आसानी से मिलती हैं? गांवों को जोड़ने वाली सड़कों की स्थिति क्या है? युवाओं को अपने इलाके में रोजगार के अवसर मिल रहे हैं या नौकरी के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है? सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में सुविधाओं का क्या हाल है? ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब किसी भी विधानसभा क्षेत्र की जमीनी तस्वीर समझने में मदद करते हैं। लेकिन पहले बात करते हैं चुनावी इतिहास की। पिछले तीन विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि मोहनलालगंज में राजनीतिक मुकाबला लगातार बदलता रहा है। 2012 में समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की, 2017 में भी सपा अपनी सीट बचाने में कामयाब रही, लेकिन 2022 में बीजेपी ने चुनावी परिणाम बदल दिया।
सबसे पहले बात साल 2012 के विधानसभा चुनाव की। उस वक्त मोहनलालगंज में समाजवादी पार्टी ने चंद्रा रावत को उम्मीदवार बनाया था। दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी की ओर से अजेय पुष्पा रावत चुनावी मैदान में थीं। जब मतगणना पूरी हुई, तो नतीजा समाजवादी पार्टी के पक्ष में आया। सपा की चंद्रा रावत को कुल 69 हजार 488 वोट मिले, जबकि बसपा की अजेय पुष्पा रावत को 45 हजार 971 वोट हासिल हुए। इस तरह चंद्रा रावत ने अजेय पुष्पा रावत को 23 हजार 517 वोटों से हराकर जीत दर्ज की। जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिए। दोनों प्रत्याशियों के बीच वोटों का अंतर 23 हजार से ज्यादा था। यानी 2012 के चुनाव में चंद्रा रावत ने बसपा प्रत्याशी पर अच्छी-खासी बढ़त बनाई थी। इस जीत के साथ मोहनलालगंज विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई और सपा ने यहां अपनी राजनीतिक पकड़ दिखाई।
अब आते हैं साल 2017 के विधानसभा चुनाव पर। इस बार भी समाजवादी पार्टी ने अपनी सीट बचाने के लिए अंबरीष सिंह पुष्कर को मैदान में उतारा। वहीं बहुजन समाज पार्टी ने राम बहादुर को उम्मीदवार बनाया। दोनों दलों के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया। जब मतगणना के आंकड़े सामने आए, तो सपा के अंबरीष सिंह पुष्कर को 71 हजार 574 वोट मिले। दूसरी तरफ बसपा के राम बहादुर को 71 हजार 44 वोट हासिल हुए। यानी दोनों प्रत्याशियों के बीच जीत का अंतर सिर्फ 530 वोट रहा! जी हां, महज 530 वोट! इतने छोटे अंतर ने मोहनलालगंज की इस चुनावी जंग का फैसला कर दिया। अंबरीष सिंह पुष्कर ने जीत दर्ज की और समाजवादी पार्टी लगातार दूसरी बार इस विधानसभा सीट पर कब्जा बनाए रखने में सफल रही। अब 2012 और 2017 के नतीजों को साथ रखकर देखिए। 2012 में सपा की जीत का अंतर 23 हजार 517 वोट था, लेकिन 2017 में यही अंतर घटकर सिर्फ 530 वोट रह गया। इसका सीधा मतलब है कि 2017 में दोनों प्रमुख प्रत्याशियों के बीच मुकाबला बेहद करीबी था। लेकिन एक बात साफ थी मोहनलालगंज में जीत का फैसला बेहद कम अंतर से हुआ था। और फिर 2022 के चुनाव में इसी सीट की तस्वीर पूरी तरह बदल गई।
अब बात करते हैं साल 2022 के विधानसभा चुनाव की। यही वह चुनाव था, जिसने मोहनलालगंज की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज किया। इस बार भारतीय जनता पार्टी ने अमरेश कुमार को उम्मीदवार बनाया, जबकि समाजवादी पार्टी की तरफ से सुशीला सरोज चुनावी मैदान में उतरीं। बहुजन समाज पार्टी ने देवेंद्र कुमार को टिकट दिया। चुनाव प्रचार हुआ, मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया और जब नतीजे सामने आए, तो बीजेपी ने जीत हासिल कर ली। भारतीय जनता पार्टी के अमरेश कुमार को कुल 1 लाख 7 हजार 89 वोट मिले। समाजवादी पार्टी की सुशीला सरोज को 90 हजार 541 वोट हासिल हुए, जबकि बहुजन समाज पार्टी के देवेंद्र कुमार को 31 हजार 623 वोट मिले। इस तरह अमरेश कुमार ने सुशीला सरोज को 16 हजार 548 वोटों से हराकर मोहनलालगंज विधानसभा सीट अपने नाम कर ली। इस नतीजे के साथ बीजेपी ने इस सीट पर पहली बार विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की और सपा के लगातार दो चुनाव जीतने का सिलसिला टूट गया। अब यहां सबसे अहम बात समझिए। 2017 में सपा ने महज 530 वोटों से जीत हासिल की थी। लेकिन 2022 में बीजेपी ने 16 हजार 548 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। यानी पांच साल पहले जिस सीट पर जीत का फैसला कुछ सौ वोटों से हुआ था, वहां अगले चुनाव में बीजेपी ने हजारों वोटों की बढ़त बना ली। 2022 के नतीजे बताते हैं कि इस बार बीजेपी का उम्मीदवार सबसे ज्यादा वोट हासिल करने में सफल रहा।
मोहनलालगंज की सियासत को समझने के लिए अब नजर डालते हैं उन सवालों पर, जो सीधे आम लोगों की जिंदगी से जुड़े हैं। सबसे पहले बात गांवों की सड़कों और परिवहन की। क्या गांवों से मुख्य बाजार, अस्पताल, स्कूल और तहसील तक पहुंचना आसान है? क्या ग्रामीण सड़कों की हालत ठीक है? क्या लोगों को आने-जाने के लिए पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन मिलता है? दूसरा बड़ा सवाल है पानी और सफाई का। क्या लोगों को नियमित रूप से साफ पेयजल मिल रहा है? बारिश के दौरान जलभराव की समस्या तो नहीं होती? नालियों की सफाई और कचरा निस्तारण की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
अब बात किसानों की। खेती-किसानी ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में सिंचाई की सुविधा, फसलों की लागत, उचित मूल्य, खाद और बीज की उपलब्धता जैसे सवालों पर किसानों की राय जानना जरूरी है। किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं, यह भी जांच का विषय है। इसके बाद आता है रोजगार का सवाल। स्थानीय युवाओं को अपने क्षेत्र में काम के अवसर कितने मिल रहे हैं? क्या उन्हें नौकरी या स्वरोजगार के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है? कौशल प्रशिक्षण और छोटे कारोबार को बढ़ावा देने वाली योजनाओं का लाभ कितना मिल रहा है? शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता कैसी है? अस्पतालों में डॉक्टर, दवाएं और जरूरी जांच की सुविधा मिलती है या लोगों को इलाज के लिए लखनऊ शहर की ओर जाना पड़ता है? और सबसे अहम सवाल जनता की शिकायतों पर कितनी जल्दी कार्रवाई होती है? सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं? स्थानीय जनप्रतिनिधि जनता के बीच कितने उपलब्ध रहते हैं?
अब सबसे बड़ा सवाल आने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव में मोहनलालगंज की जनता किसे मौका देगी? क्या बीजेपी अपनी जीत को बरकरार रख पाएगी? क्या समाजवादी पार्टी 2012 और 2017 वाला प्रदर्शन दोहराने के लिए मजबूत चुनौती पेश करेगी? या चुनावी मैदान में कोई नया समीकरण देखने को मिलेगा? फिलहाल इन सवालों का पक्का जवाब देना संभव नहीं है। लेकिन पिछले तीन चुनावों के नतीजे राजनीतिक दलों के लिए कई संकेत जरूर छोड़ते हैं। समाजवादी पार्टी ने 2012 और 2017 में जीत दर्ज की। 2017 में जीत का अंतर सिर्फ 530 वोट था। इसके बाद 2022 में बीजेपी ने 16 हजार 548 वोटों से जीत हासिल कर सीट अपने नाम कर ली। आने वाले चुनाव में उम्मीदवार कौन होंगे, राजनीतिक दल किन मुद्दों को प्राथमिकता देंगे, पिछले कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को लेकर जनता की क्या राय होगी और स्थानीय समस्याओं पर क्या जवाब सामने आएंगे इन सभी बातों पर नजर रखनी होगी।
तो यह थी लखनऊ जिले की मोहनलालगंज विधानसभा सीट की पूरी चुनावी कहानी-2012 से 2022 तक का पूरा हिसाब।
2012 में समाजवादी पार्टी की चंद्रा रावत ने 23 हजार 517 वोटों से जीत हासिल की। 2017 में सपा के अंबरीष सिंह पुष्कर ने महज 530 वोटों के अंतर से सीट बचाई। लेकिन 2022 में बीजेपी के अमरेश कुमार ने 16 हजार 548 वोटों से जीत दर्ज कर सियासी तस्वीर बदल दी। तीन चुनाव, अलग-अलग मुकाबले और बदलते नतीजे मोहनलालगंज की राजनीति ने दिखा दिया कि चुनावी मैदान में कुछ भी पहले से तय नहीं होता। अब 2027 में जनता किसे चुनेगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन उससे पहले जनता के असली सवालों पर चर्चा जरूरी है। सड़क, पानी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की समस्याओं पर कितना काम हुआ? जनता अपने विधायक के कामकाज से कितनी संतुष्ट है? और राजनीतिक दल आने वाले चुनाव में इन सवालों का क्या जवाब देंगे? क्योंकि लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास होती है। नेता वादे करते हैं, पार्टियां चुनाव लड़ती हैं, लेकिन आखिरी फैसला मतदाता ही करता है। मोहनलालगंज की अगली सियासी कहानी क्या होगी, इसका जवाब आने वाला चुनाव देगा। फिलहाल इतना तय है कि इस सीट का पिछला चुनावी इतिहास हर राजनीतिक दल के लिए समझने और सीखने का मौका जरूर देता है।

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