ऊंचाई पर जाने को मजबूर हुई उत्तराखंड की मोनाल, बदल गई आवाज; वैज्ञानिकों ने जताया बड़ा खतरा
उत्तराखंड की पहचान से जुड़ी हिमालयी मोनाल अब बदलते पहाड़ी वातावरण के बीच नई चुनौतियों का सामना कर रही है। अपनी चमकदार रंगत और खूबसूरत पंखों के लिए पहचाने जाने वाली यह चिड़िया सिर्फ पहाड़ों की प्राकृतिक खूबसूरती का हिस्सा नहीं है, बल्कि उत्तराखंड का राजकीय पक्षी भी है। नेपाल में भी इसे राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा हासिल है।
हाल में सामने आई दो रिसर्च ने मोनाल के बदलते व्यवहार और उसके सामने खड़े पर्यावरणीय संकट की तस्वीर पेश की है। शोध के मुताबिक, पहाड़ी इलाकों में बढ़ता पर्यटन, निर्माण गतिविधियां और इंसानी शोर इस पक्षी के प्राकृतिक जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि कुछ इलाकों में मोनाल को पहले के मुकाबले अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर जाना पड़ रहा है।
प्राकृतिक ठिकानों से ऊपर की ओर बढ़ रही मोनाल
शोधकर्ताओं के अनुसार, पहाड़ों के ऊंचे इलाकों में मौजूद घास के मैदान मोनाल के लिए महत्वपूर्ण आवास हैं। लेकिन इन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां बढ़ने के साथ इनके लिए उपलब्ध जगह प्रभावित हो रही है। इसका असर पक्षियों के आवास और उनके वितरण पर दिखाई दे रहा है।
वैज्ञानिकों को आशंका है कि बदलते मौसम और लगातार सिकुड़ते आवास के कारण मोनाल को भविष्य में और ऊंचे तथा सीमित क्षेत्रों की तरफ जाना पड़ सकता है। अगर अलग-अलग इलाकों में रहने वाले पक्षियों के समूह एक-दूसरे से कटते गए, तो उनके बीच प्रजनन की संभावना भी प्रभावित हो सकती है। लंबे समय में इससे स्थानीय आबादी के कमजोर पड़ने और कुछ क्षेत्रों से मोनाल के गायब होने का जोखिम बढ़ सकता है।
इंसानी शोर के बीच बदल रही है मोनाल की आवाज
मोनाल पर हुए दूसरे अध्ययन ने उसके संचार व्यवहार में बदलाव की ओर ध्यान खींचा है। शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि लगातार बढ़ता मानवीय शोर इन पक्षियों की आवाज पर किस तरह असर डाल रहा है।
इसके लिए उत्तराखंड के केदारनाथ कस्तूरी मृग अभयारण्य की दो अलग-अलग घाटियों को चुना गया। चोपता में पर्यटन और मानवीय गतिविधियां अपेक्षाकृत ज्यादा हैं, जबकि मदमहेश्वर को अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र के तौर पर अध्ययन में शामिल किया गया।
अप्रैल 2023 से करीब एक साल तक शोधकर्ताओं ने इन इलाकों में मोनाल की आवाजें रिकॉर्ड कीं। 700 से ज्यादा वोकल रिकॉर्डिंग का विश्लेषण करते हुए उनकी आवाज की पिच, अवधि और आसपास मौजूद शोर के स्तर की तुलना की गई।
शोर बढ़ा तो मोनाल ने बदली आवाज की पिच
रिसर्च में सामने आया कि ज्यादा शोर वाले इलाके में रहने वाली मोनाल की आवाज की पीक फ्रीक्वेंसी शांत इलाके में रहने वाले पक्षियों की तुलना में अधिक थी। आसान शब्दों में कहें तो इंसानी गतिविधियों से पैदा होने वाले शोर के बीच अपनी आवाज को दूसरे पक्षियों तक पहुंचाने के लिए मोनाल अपने संचार के तरीके में बदलाव कर रही है।
खास बात यह है कि आवाज में दर्ज किए गए ये अंतर इतने सूक्ष्म थे कि सामान्य तौर पर इंसानी कान उन्हें महसूस नहीं कर सकते। हालांकि रिकॉर्डिंग उपकरणों और वैज्ञानिक विश्लेषण के जरिए इन बदलावों को स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया।
वैज्ञानिकों की चिंता सिर्फ आवाज बदलने तक सीमित नहीं
दोनों अध्ययनों का नेतृत्व उत्तराखंड के हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया। डॉ. राजीव लोचन के साथ दिनेश कुमार शर्मा और आनंद कुमार ने इन अध्ययनों में काम किया।
शोधकर्ताओं के सामने चिंता का बड़ा सवाल यह है कि अगर मोनाल के आवास लगातार छोटे होते गए और इंसानी गतिविधियों का दबाव बढ़ता रहा, तो इसके असर सिर्फ उसके व्यवहार तक सीमित नहीं रहेंगे। आवासों का बिखराव और अलग-अलग समूहों के बीच दूरी बढ़ने से प्रजनन और आबादी के प्राकृतिक विस्तार पर भी असर पड़ सकता है।
मोनाल का ऊंचाई की ओर खिसकना और शोर के बीच अपनी आवाज में बदलाव करना इस बात के संकेत हैं कि पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र में मानवीय दबाव का असर वन्यजीवों के व्यवहार तक पहुंच रहा है। ऐसे में इस पक्षी के प्राकृतिक आवासों को बचाना और संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को नियंत्रित करना इसके भविष्य के लिए अहम हो सकता है।

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