कीचड़ से तैयार हुआ स्वादिष्ट फल, देश-विदेश तक है इस फल की भारी डिमांड...

“कीचड़ में ही कमल खिलता है” यह कहावत पाली के मशहूर सिंघाड़ों पर बिल्कुल सटीक बैठती है। तालाब के कीचड़ और ठहरे हुए पानी में उगने वाला यह देसी फल अपनी प्राकृतिक मिठास और बेहतरीन स्वाद के लिए देशभर में खास पहचान रखता है। मानसून की बारिश के साथ ही पाली में सिंघाड़ों का सीजन शुरू हो गया है। स्थानीय बाजारों के साथ-साथ देश के कई बड़े शहरों और विदेशों में भी इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

लॉर्डिया तालाब में होती है मेहनतभरी खेती

पाली के लॉर्डिया तालाब में सिंघाड़े की खेती बेहद मेहनत और धैर्य का काम है। जून-जुलाई में मानसून की शुरुआत के साथ तालाब के कीचड़युक्त पानी में इसकी बेलें लगाई जाती हैं। समय के साथ पौधों की पत्तियां पानी की सतह पर फैल जाती हैं, जबकि फल पानी के भीतर कीचड़ में तैयार होता है। किसान और मजदूर नाव या बड़े टब की मदद से तालाब में उतरकर एक-एक सिंघाड़ा चुनते हैं। यह पूरी प्रक्रिया कठिन होने के साथ जोखिम भरी भी होती है।

प्राकृतिक मिठास और पोषण से भरपूर

पाली के सिंघाड़े अपनी प्राकृतिक मिठास, कुरकुरे स्वाद और ताजगी के लिए मशहूर हैं। इनमें पोटैशियम, जिंक, विटामिन-बी और फाइबर जैसे कई पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यही कारण है कि व्रत और उपवास के दौरान इसे फलाहार के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है। रासायनिक खाद के बिना प्राकृतिक जल पारिस्थितिकी में तैयार होने से इसका स्वाद अन्य क्षेत्रों के सिंघाड़ों से अलग और अधिक आकर्षक माना जाता है।

देश-विदेश तक है पाली के सिंघाड़ों की मांग

पाली के लॉर्डिया तालाब से निकलने वाले सिंघाड़ों की सप्लाई केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है। सीजन शुरू होते ही जोधपुर, जयपुर, अहमदाबाद और मुंबई जैसी बड़ी मंडियों में इसकी भारी खेप भेजी जाती है। इसके अलावा खाड़ी देशों सहित विदेशों में रहने वाले प्रवासी मारवाड़ी परिवारों के बीच भी पाली के सिंघाड़ों की खास मांग रहती है, जिसके चलते हर साल पहले से ही ऑर्डर मिलने लगते हैं।

किसानों की आजीविका का मजबूत आधार

लॉर्डिया तालाब में होने वाली सिंघाड़े की खेती क्षेत्र के कई किसान परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन है। किसानों की मेहनत और पारंपरिक खेती की बदौलत पाली के सिंघाड़ों ने कृषि उत्पादों की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। अपनी गुणवत्ता, स्वाद और बढ़ती मांग के कारण यह उत्पाद न केवल किसानों की आय बढ़ा रहा है, बल्कि पाली जिले का नाम भी देश और विदेश तक पहुंचा रहा है।

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