"मुद्दत से लापता है ख़ुदा जाने क्या हुआ"- अख़्तर सईद खां

12 अक्टूबर 1930 को भोपाल में पैदा हुए अख़्तर सईद खां जो वह अफ़ग़ानी हैं। अख़्तर सईद के दादा अहमद सईद खां भोपाल के जागीरदारों में शामिल थे और शायरी में दिलचस्पी रखते थे और उनकी कद्र किय करते थे। लिहाज़ा शिक्षा और साहित्य से जुड़े इस माहौल के चलते अख़्तर सईद का झुकाव अपने आप साहित्य की ओर होने लगा। उन्होंने छोटी उम्र में ही शेर-ओ-शायरी लिखना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे जैसे-जैसे उम्र बढ़ी तो साहित्य के प्रति उनकी रूचि और अधिक बढ़ती गई और साथ ही लिखावट में और अभी निखार आता गया। उन्होंने नज़्मों के साथ-साथ ग़ज़लों को भी लिखा जो उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनीं। आज अप सभी के लिए पेश है अख़्तर सईद खां लिखी कुछ ख़ास ग़ज़लें...।
कहें किस से हमारा खो गया क्या,
किसी को क्या के हम को हो गया क्या।
खुली आँखों नज़र आता नहीं कुछ,
हर इक से पूछता हूँ वो गया क्या।
मुझे हर बात पर झुटला रही है,
ये तुझ बिन ज़िंदगी को हो गया क्या।
उदासी राह की कुछ कह रही है,
मुसाफ़िर रास्ते में खो गया क्या।
ये बस्ती इस क़दर सुनसान कब थी,
दिल-ए-शोरीदा थक कर सो गया क्या।
चमन-आराई थी जिस गुल का शेवा,
मेरी राहों में काँटे बो गया क्या।।
मुद्दत से लापता है ख़ुदा जाने क्या हुआ,
फिरता था एक शख़्स तुम्हें पूछता हुआ।
वो ज़िंदगी थी आप थे या कोई ख़्वाब था,
जो कुछ था एक लम्हे को बस सामना हुआ।
हम ने तेरे बग़ैर भी जी कर दिखा दिया,
अब ये सवाल क्या है के फिर दिल का क्या हुआ।
सो भी वो तू न देख सकी ऐ हवा-ए-दहर,
सीने में इक चराग़ रक्खा था जला हुआ।
दुनिया को ज़िद नुमाइश-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर से थी,
फ़रियाद मैं ने की न ज़माना ख़फ़ा हुआ।
हर अंजुमन में ध्यान उसी अंजुमन का है,
जागा हो जैसे ख़्वाब कोई देखता हुआ।
शायद चमन में जी न लगे लौट आऊँ मैं,
सय्याद रख क़फ़स का अभी दर खुला हुआ।
ये इज़्तिराब-ए-शौक़ है 'अख़्तर' के गुम-रही,
मैं अपने क़ाफ़िले से हूँ कोसों बढ़ा हुआ।।
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