जब श्री राधारमण लाल जू के प्रांगड़ में लौटा नंद बाबा के नंदोत्सव का उल्लास

जन्माष्टमी के अगले दिन बृजभूमि में उल्लास का एक और सुंदर पर्व मनाया जाता है—नंदोत्सव। यह वही पावन अवसर है, जब नंद बाबा के घर कन्हैया के जन्म की खुशी में उत्सव मनाया गया था। पुत्र प्राप्ति के आनंद में नंद बाबा ने ब्रजवासियों को जमकर दान दिया और अपनी खुशी को सभी के साथ बांटा। मान्यता है कि नंद बाबा ने इस अवसर पर इतना कुछ लुटाया कि पूरा बृज उनकी उदारता और आनंद से सराबोर हो गया।

श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी केवल नंद भवन तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरा गोकुल इस आनंद में डूब गया। कहीं बधाइयां गूंजीं, कहीं मंगल गीत गाए गए तो कहीं नंद बाबा की ओर से दान-दक्षिणा और उपहार लुटाए गए। इसी दिव्य प्रसंग की स्मृति में आज भी बृज सहित देशभर के मंदिरों में नंदोत्सव बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

जन्माष्टमी पर संपूर्ण विश्व में लाला के प्राकट्य का इंतजार खत्म होता है, लेकिन श्री राधारमण लाल जू मंदिर में उत्सव मानो अगले दिन अपने चरम पर पहुंचता है। क्योंकि अगले दिन होता है नंदोत्सव —वह दिन, जिसका इंतजार यहां के गोसाईं जन को जन्माष्टमी से भी अधिक रहता है।

जिस प्रकार नंद बाबा ने कन्हैया के जन्म की खुशी में धन, वस्त्र, आभूषण और उपहार ब्रजवासियों में लुटा दिए। श्री राधारमण लाल जू मंदिर में भी इसी भाव का जीवंत स्वरूप देखने को मिलता है। नंदोत्सव के दिन गोसाईं जन अपने आराध्य के जन्म की खुशी में प्रसाद और उपहार भक्तों पर लुटाते हैं। जिसे पाने के लिए भक्तों में भी खासा उत्साह नजर आता है।

मंदिर प्रांगण का पूरा वातावरण उस समय मानो नंद बाबा के आंगन में बदल जाता है। बधाइयों की गूंज, भक्तों का उल्लास और गोसाईं जन का प्रेमपूर्वक प्रसाद लुटाना—हर दृश्य में वही बृज वाला आनंद दिखाई देता है।

और फिर दधि-कांदो की वो झलक… दही-माखन की फुहारों के बीच मानो नंद बाबा के आंगन का वही उल्लास फिर लौट आता है। लाला के जन्म की खुशी में जो आनंद तब बृज पर बरसा था, उसकी एक झलक आज भी श्री राधारमण लाल जू के आंगन में देखने को मिलती है।

इसलिए यहां से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।

कोई हाथों में प्रसाद लेकर जाता है, कोई बधाई लेकर,

कोई आंखों में उस उत्सव की चमक लेकर, तो कोई हृदय में लाला का आनंद लेकर।

किसी के हिस्से में कुछ वस्तुएं आती हैं, तो किसी के हिस्से में एक अनमोल स्मृति…

लेकिन लौटता हर कोई अपने साथ नंदोत्सव का आनंद लेकर ही है।

क्योंकि यहां लुटती केवल बधाई नहीं—

लुटता है प्रेम, लुटता है वात्सल्य और लुटती है लाला के जन्म की वह खुशी, जो बांटने से और बढ़ती जाती है।

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