नारायण दत्त तिवारी: जेल से कैबिनेट तक का सफर

आज हम बात करेंगे उत्तर प्रदेश के नवें मुख्यमंत्री और उत्तराखंड के भी एक बार मुख्यमंत्री रहे, एक ऐसे नेता की जिनके लिए कहा जाता है कि विवादों से वे दूर रहे, लेकिन उनके निजी जीवन में कई खट्टे-मीठे किस्से भी छुपे हैं। उनकी राजनीति में कभी अतीत नहीं रहा, बल्कि राख से जल उठने जैसा उनका जज्बा हमेशा उनकी खास पहचान रहा। यह कहानी है नारायण दत्त तिवारी की।

एनडी तिवारी का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को नैनीताल के बलूती गांव में हुआ था। उनके पिता पूर्णानंद तिवारी वन विभाग में अफसर थे, जिन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान नौकरी छोड़ दी थी। तिवारी ने हल्द्वानी, बरेली और नैनीताल के स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा ग्रहण की। वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सक्रिय हुए और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ चिट्ठियां लिखने के कारण 14 दिसंबर 1942 को गिरफ्तार होकर नैनीताल की जेल भेजे गए, जहां उनके पिता पहले से बंद थे। 15 महीने जेल में बिताने के बाद उन्हें रिहा किया गया और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आगे की पढ़ाई जारी रखी। 1947 में वे स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष बने और 1945-49 तक ऑल इंडिया स्टूडेंट कांग्रेस के सचिव रहे।

राजनीतिक जीवन की बात करें तो, एनडी तिवारी ने 1952 में पहले चुनाव में नैनीताल से प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक के रूप में प्रवेश किया। 1957 में फिर से विधायक चुने गए और विपक्ष के नेता बने। 1963 में कांग्रेस में शामिल हुए, काशीपुर से विधायक बने और यूपी सरकार में मंत्री पद संभाला। उन्होंने 1968 में नेहरू युवा केंद्र की स्थापना की, जो एक स्वैच्छिक संगठन है। 1969 से 1971 के बीच इंडियन यूथ कांग्रेस के पहले अध्यक्ष भी रहे।

तिवारी तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे। 1979-80 में चौधरी चरण सिंह की सरकार में वित्त और संसदीय कार्य मंत्री, 1980 के बाद योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन, 1985-88 में राज्यसभा सांसद, 1985 में उद्योग मंत्री, 1986-87 में विदेश मंत्री और 1987-88 में वित्त एवं वाणिज्य मंत्री के पदों पर भी रहे। 2007 से 2009 तक आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे, जहां एक कथित सेक्स स्कैंडल के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, हालांकि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया।

राजनीतिक दफ्तर में तिवारी की कार्यशैली काफी कड़क मानी जाती थी। वे दिन में 18 घंटे तक काम करते थे, सभी फाइलें खुद पढ़ते और अधिकारियों से सीधे सवाल-जवाब करते थे। उनकी लाल कलम से फाइलों पर बने निशान और सख्त सवाल अधिकारियों के लिए डर का कारण थे।

हालांकि तिवारी सियासत के माहिर खिलाड़ी थे, जिन्होंने हर खतरे को भांपकर उसे टालना जान लिया। उनका राजनीतिक कद 90 के दशक तक उत्तर प्रदेश में काफी ऊंचा रहा। लेकिन उनके निजी जीवन में विवादों की परछाईं भी रही, खासकर उनके 80 के दशक के बाद। 2014 में उन्होंने दूसरी शादी की, जो लंबे समय से चर्चा में रही। उनकी निजी जिंदगी में उनके बेटे रोहित शेखर द्वारा पितृत्व का केस भी खूब सुर्खियां बटोर चुका है।

नारायण दत्त तिवारी का निधन 18 अक्टूबर 2018 को उनके जन्मदिन पर ही हुआ। उनकी जिंदगी ने राजनीति के साथ-साथ निजी संघर्षों की भी कई कहानियां हमें दीं। राजनीति से परे उनका जीवन विवादों में भले रहा हो, लेकिन उनकी सियासत ने उन्हें भारतीय राजनीति के एक महत्त्वपूर्ण और जुझारू नेता के रूप में अमर कर दिया।

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