कौन चला रहा था छात्र आंदोलन? फंडिंग से हिंसा तक बड़े सवाल

हाल ही में नीट पेपर लीक को लेकर देश की राजधानी में छात्रों का एक बहुत बड़ा आंदोलन हुआ। कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले छात्र सड़कों पर उतरे, जंतर-मंतर पर डटे और अपनी आवाज़ उठाई। नतीजा यह हुआ कि सरकार को दबाव में आना पड़ा और आखिरकार शिक्षा मंत्री को अपना इस्तीफा भी देना पड़ा। लेकिन, क्या इस पूरी जीत के पीछे कुछ ऐसा भी था जो देश के सामने पूरी तरह से नहीं आ पाया? क्या हक की लड़ाई के नाम पर दिल्ली की सड़कों पर अराजकता का खेल रचा गया? आज हम आपसे, यानी देश की आम जनता और अपने दर्शकों से सीधे वो सवाल पूछने आए हैं, जिन्हें पूछने से अक्सर लोग कतराते हैं! क्या छात्रों का यह प्रदर्शन सही था या फिर इसे किसी और शांतिपूर्ण रास्ते से भी हल किया जा सकता था? क्या यह सिर्फ मासूम छात्रों का आंदोलन था या फिर इसके पीछे कुछ असामाजिक और अराजक तत्वों की सोची-समझी साजिश थी? 

सवाल यह भी कि क्या इस प्रदर्शन का रुख अपनी मूल मांगों से भटककर पूरी तरह से राजनीतिक हो गया? क्या विपक्ष पर्दे के पीछे से इस पूरे बवंडर को हवा दे रहा था? इस प्रदर्शन को चलाने के लिए लाखों-करोड़ों की फंडिंग आखिर कहाँ से आ रही थी? वो कौन लोग थे जो बिना पुलिस की वर्दी पहने, सादे कपड़ों में भीड़ में घुसकर लाठियां भांज रहे थे और माहौल बिगाड़ रहे थे? उन्हें किसने भेजा था...किसी राजनीतिक दल ने या किसी विदेशी ताकत ने? इतना ही नहीं, प्रदर्शन के दौरान देश के प्रधानमंत्री के लिए जिस तरह की अभद्र और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल हुआ, क्या लोकतंत्र में अपने हक की मांग करने का यह तरीका सही है? 

क्या देश के युवाओं को ऐसा रास्ता चुनना चाहिए? और इस पूरे आंदोलन के बीच एक और चौंकाने वाला नाम सामने आया...जुनैद मलिक का! प्रदर्शन के दौरान छात्रों को बड़े पैमाने पर खाना खिलाने वाले जुनैद मलिक के पास इतना पैसा कहाँ से आ रहा था? कौन उन्हें फंड कर रहा था? और सबसे बड़ा खुलासा तो यह हुआ कि जुनैद मलिक पर अवैध हथियार रखने और गौहत्या जैसे गंभीर और संगीन आरोप दर्ज हैं! क्या यह सच है? और अगर सच है, तो ऐसे विवादित चेहरे छात्रों के आंदोलन के बीच में क्या कर रहे थे? 

उधर दूसरी तरफ, देश की संसद यानी लोकसभा से एक और नई तस्वीर सामने आई है! नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अक्सर आरोप लगाते रहते हैं कि संसद में उनका माइक बंद कर दिया जाता है और उन्हें बोलने नहीं दिया जाता। लेकिन बीते दिनों सामने आई तस्वीरों ने एक अलग ही कहानी बयां कर दी! वीडियो में साफ़ देखा गया कि राहुल गांधी ने खुद अपना माइक बंद किया और फिर आरोप लगा दिया कि सरकार ने उनका माइक बंद कर दिया है! यह पहली बार नहीं है जब ऐसा दावा किया गया हो। तो क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक ड्रामा है या इसके पीछे कोई और सच्चाई है? 

दर्शको! एक सशक्त लोकतंत्र की नींव इस बात पर टिकी होती है कि देश की जनता कितनी जागरूक है। छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन हक की लड़ाई जब हिंसा, गाली-गलौज, संदिग्ध फंडिंग और राजनीतिक स्टंटबाजी का शिकार बन जाए, तो नुकसान देश के उन मासूम युवाओं का ही होता है जो सच्चे दिल से अपने हक के लिए लड़ रहे होते हैं। 

इसीलिए आज हम फैसला सुनाने नहीं आए हैं...बल्कि आपकी राय जानना चाहते हैं। आप इस पूरे मुद्दे पर क्या सोचते हैं? क्या छात्रों का यह उग्र प्रदर्शन सही था, या इसे टेबल पर बैठकर शांतिपूर्वक भी सुलझाया जा सकता था? क्या आपको लगता है कि इस आंदोलन के पीछे राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग और असामाजिक तत्वों का हाथ था? और क्या संसद में सत्ता और विपक्ष दोनों को पूरी पारदर्शिता के साथ अपनी बात रखने का समान अवसर मिलना चाहिए? अपनी राय हमें जरुर बताएं, क्योंकि देश को बदलने के लिए आपकी आवाज़ सबसे ज्यादा मायने रखती है! 

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