खामेनेई का 'लखनऊ कनेक्शन': नितिन गडकरी ने सुनाया मुलाकात का वो राज़!
राजनीति के गलियारों से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक, एक ऐसी खबर आई है जिसने सबको हैरान कर दिया है! जहाँ एक तरफ ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बारूद की गंध फैली है, वहीं भारत के 'रोडवेज़ किंग' नितिन गडकरी ने एक ऐसा राज़ खोला है जो सदियों पुराने रिश्तों की गवाही दे रहा है। क्या आप जानते हैं कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का दिल उत्तर प्रदेश के लखनऊ के लिए धड़कता है? क्या आपको पता है कि ईरान की पर्शियन भाषा की जड़ें भारत की संस्कृत में छिपी हैं? नागपुर में बीजेपी के स्थापना दिवस पर गडकरी ने जब खामेनेई के साथ अपनी मुलाकात का 'सीक्रेट' पन्ना खोला, तो सुनने वालों के होश उड़ गए। आइए जानते हैं क्या था वो किस्सा जिसने भारत-ईरान के रिश्तों को एक नई रूह दे दी है!
नागपुर के भव्य समारोह में नितिन गडकरी ने उस वक्त का जिक्र किया जब वे चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के सिलसिले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई से मिलने पहुंचे थे। गडकरी ने बताया कि बातचीत के दौरान खामेनेई साहब ने उनसे एक ऐसा सवाल पूछा जिसका जवाब उनके पास भी नहीं था। खामेनेई ने पूछा- "गडकरी साहब, क्या आपको पता है कि पर्शियन भाषा कहाँ से आई है?" जब गडकरी ने अनभिज्ञता जताई, तो खामेनेई ने मुस्कुराते हुए बड़ा खुलासा किया: "पर्शियन भाषा संस्कृत से आई है! संस्कृत ही हमारी मूल भाषा है।" उन्होंने गर्व से बताया कि आज भी ईरान की यूनिवर्सिटीज़ में 'संस्कृत विभाग' पूरी सक्रियता से चलता है।
किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ। खामेनेई ने गडकरी को अपनी जड़ों के बारे में बताते हुए चौंका दिया। उन्होंने खुद स्वीकार किया कि उनका और उनके परिवार का पुराना रिश्ता भारत से है। "आपको पता है हम कहाँ के रहने वाले हैं? हमारा ओरिजिन लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के पास के एक गांव का है।" गडकरी ने इस बात पर जोर दिया कि अलग भाषा और अलग भेष होने के बावजूद, सांस्कृतिक रूप से हमारा जुड़ाव कितना गहरा है। उन्होंने संदेश दिया कि 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि हकीकत में सरहदों के पार तक फैली है।
नितिन गडकरी ने अपनी सात-आठ ईरान यात्राओं का अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वे चाबहार पोर्ट के काम से स्पेशल फ्लाइट से ईरान जाते थे, तब उन्हें इतिहास की नई गहराइयों का पता चला। उन्होंने कहा: हमारा रिश्ता सिर्फ सिंधु नदी तक सीमित नहीं है। सिंधु नदी के उद्गम से भी आगे जाकर, ईरान की धरती तक 'आर्य संस्कृति' के पदचिह्न मिलते हैं। भारत और ईरान का रिश्ता व्यापारिक नहीं, बल्कि 'डीएनए' और 'संस्कृति' का है।
ईरान पर मंडराते युद्ध के बादलों के बीच गडकरी का यह बयान बेहद अहम माना जा रहा है। उन्होंने बताया कि कैसे भारत ने चाबहार पोर्ट के जरिए एक रणनीतिक जीत हासिल की थी और कैसे भारत का प्रभाव आज भी उन मुल्कों में है जो दुनिया की बड़ी ताकतों से लोहा ले रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति ही उसकी सबसे बड़ी 'सॉफ्ट पावर' है।
गडकरी का यह किस्सा साबित करता है कि सरहदें सिर्फ ज़मीन बांटती हैं, विरासत नहीं! लखनऊ का वो गांव आज भी ईरान के सबसे ताकतवर शख्स की यादों में ज़िंदा है। क्या संस्कृत और लखनऊ का यह कनेक्शन भविष्य में भारत और ईरान के रिश्तों की नई इबारत लिखेगा? क्या युद्ध के इस दौर में ये सांस्कृतिक पुल शांति का रास्ता दिखाएंगे? गडकरी के इस खुलासे ने इतिहास के पन्नों को फिर से पलट दिया है।


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