बिहार की राजनीति का भूकंप: नीतीश कुमार का विधान परिषद से इस्तीफा

बिहार की राजनीति की धुरी, सुशासन के पर्याय और चाणक्य नीति के माहिर खिलाड़ी रहे नीतीश कुमार ने आज एक ऐतिहासिक पन्ना पलट दिया है। जी हां आज सोमवार सुबह जैसे ही आधिकारिक मुहर लगी कि नीतीश कुमार ने बिहार विधान परिषद की सदस्यता छोड़ दी है, वैसे ही पटना से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में भूकंप सा आ गया। यह सिर्फ एक इस्तीफा नहीं है, बल्कि बिहार की सत्ता के उस केंद्र बिंदु का विस्थापन है जो पिछले दो दशकों से राजनीति  की पहचान बना हुआ था। जेडीयू के सिपहसालार संजय गांधी जब इस्तीफा लेकर सभापति के पास पहुंचे, तो वह कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि बिहार के एक सुनहरे संसदीय अध्याय का समापन था।

आपको बता दें नीतीश कुमार का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। एक युवा इंजीनियर, जो 1974 के जेपी आंदोलन की आग में तपा, जिसने हार से सीखा और फिर जीत को अपनी आदत बना लिया। 1977 और 1980...ये वो साल थे जब नीतीश कुमार को हरनौत की जनता ने नकारा था। हार इतनी कड़वी थी कि उन्होंने राजनीति छोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन उनके करीबियों ने उन्हें संभाला। तब उन्होंने कहा था कि "एक मौका मिला तो जनता की सेवा का सपना पूरा करूंगा।" और फिर 1985 में जब वे पहली बार विधायक बने, तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। नीतीश कुमार के नाम अब वो रिकॉर्ड दर्ज हो गया है जिसे तोड़ना किसी भी राजनेता के लिए हिमालय चढ़ने जैसा है। 

नीतीश कुमार 1985 में पहली बार विधायक बने 

वर्ष 1989 में नीतीश कुमार ने बाढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा 

फिर 1991, 1996, 1998 और 1999 में लगातार पांच बार बाढ़ से सांसद चुने गए

रेलवे के साथ ही सड़क परिवहन और कृषि जैसे मंत्रालय संभाले

बिहार की कमान को 10 बार संभालने का कीर्तिमान बनाया 

विधानसभा, लोकसभा, विधान परिषद और अब राज्यसभा का हिस्सा बने

इतना ही नहीं बिहार नीतीश कुमार को हमेशा उनके कामों के लिए याद रखेगा। सत्ता में रहते हुए नीतीश कुमार ने बिहार के विकास और वहां की जनता के लिए कई कार्य किए। जैसे...

साइकिल योजना: जिसने बेटियों को स्कूल की दहलीज तक पहुँचाया।

50% महिला आरक्षण: पंचायतों में आधी आबादी को असली ताकत दी।

शराबबंदी: एक ऐसा सामाजिक प्रयोग जिसने समाज की दिशा बदली।

सड़क और बिजली: 'लालटेन युग' से निकलकर बिहार को चकाचौंध रोशनी तक पहुँचाया।

लगातार दो हार से शुरू हुआ नीतीश कुमार का सियासी सफर अब विकास का प्रतीक बन चुका था। हर चुनौती में उन्होंने बिहार को आगे बढ़ाया। 20 नवंबर 2025 को उन्होंने रिकॉर्ड 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिसे तोड़ना लगभग असंभव है। अब जब आज वो विधान परिषद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जा रहे हैं, तो यह सफर नई मंजिल की ओर बढ़ रहा है। आपको बता दें इस्तीफा देने से पहले रविवार की शाम मुख्यमंत्री आवास पर सस्पेंस अपनी चरम सीमा पर था। जेडीयू के दिग्गज नेता ललन सिंह, संजय झा, विजय चौधरी और अशोक चौधरी देर रात तक रणनीति बुनते रहे। इस्तीफा तो तय था, लेकिन सवाल था 'कब'? आज सुबह सभापति अवधेश नारायण सिंह ने जब इस्तीफा स्वीकार किया, तो उन्होंने भावुक होकर कहा कि "उनके जाने से बिहार दुखी है, उन्होंने राज्य को विकसित बनाया है।" सिर्फ नीतीश ही नहीं, भाजपा के 'पोस्टर बॉय' और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी बांकीपुर विधायक पद को ठुकरा कर दिल्ली का रुख कर लिया है। नितिन नबीन भी राज्यसभा जा रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने इस्तीफे का ऐलान कर साफ कर दिया कि अब बिहार की कमान संभालने वाली टीम दिल्ली में बैठकर बड़ी बिसात बिछाएगी।

ऐसे में देखा जाए तो इस्तीफा हो गया, राज्यसभा का टिकट पक्का हो गया, लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी कब छोड़ेंगे? दरअसल, नियम कहता है कि वे बिना सदन का सदस्य रहे भी 6 महीने तक सीएम रह सकते हैं। लेकिन कयासों का बाजार गर्म है कि 10 अप्रैल को राज्यसभा की शपथ लेने से पहले बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की बड़ी पटकथा लिखी जा सकती है। ऐसे में सवाल है कि क्या बिहार को नया मुख्यमंत्री मिलेगा? क्या नीतीश दिल्ली में कोई बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं? फिलहाल तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि बिहार की राजनीति से 'नीतीश युग' का एक हिस्सा विदा हो रहा है, ताकि राष्ट्रीय फलक पर एक नई चमक बिखेरी जा सके। आप भी तैयार रहिए, क्योंकि बिहार की राजनीति में अभी 'क्लाइमेक्स' आना बाकी है! 

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