अनवर शऊर- "लौट कर न देखूँगा चल पड़ा अगर तनहा।"

अनवर शऊर उर्दू के मशहूर शायरों में शुमार हैं। उन्होंने कई ग़ज़लें, शेर, शायरी और चंद किताबें भी लिखी हैं। दुनिया में अपनी खुशकिस्मती और अपने वजूद को बनाने पर जोर देने के साथ अनवर शऊर ने अपनी ग़ज़लों में दिल के जज़्बात को भी बखूबी बयाँ किया है। जब बात दिल की हो और वो भी शेर-ओ-शायरी के ज़रिये तो ऐसे में इंसान की बनाई गई सरहदें भी जज़्बात को रोक नहीं पाती हैं। आइये आज हम और आप पढ़ते हैं अनवर शऊर की कुछ चुनिन्दा ग़ज़लें...।
गो कठिन है तय करना उम्र का सफ़र तनहा,
लौट कर न देखूँगा चल पड़ा अगर तनहा।
सच है उम्र भर किस का कौन साथ देता है,
ग़म भी हो गया रुख़्सत दिल को छोड़ कर तनहा।
आदमी को गुम-राही ले गई सितारों तक,
रह गए बयाबाँ में हज़रत-ए-ख़िज़्र तनहा।
है तो वज्ह-ए-रुसवाई मेरी हम-रही लेकिन,
रास्तों में ख़तरा है जाओगे किधर तनहा।
ऐ 'शऊर' इस घर में इस भरे पड़े घर में,
तुझ सा ज़िंदा-दिल तनहा और इस क़दर तनहा।।
इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह,
ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह।
कह तो सकता हूँ मगर मजबूर कर सकता नहीं,
इख़्तियार अपनी जगह है बेबसी अपनी जगह।
कुछ न कुछ सच्चाई होती है निहाँ हर बात में,
कहने वाले ठीक कहते हैं सभी अपनी जगह।
सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं,
ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह।
दोस्त कहता हूँ तुम्हें शाएर नहीं कहता 'शुऊर',
दोस्ती अपनी जगह है शाएरी अपनी जगह।।
फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था'
वो मुझ से इंतिहाई ख़ुश ख़फ़ा होने से पहले था।
किया करते थे बातें ज़िंदगी-भर साथ देने की,
मगर ये हौसला हम में जुदा होने से पहले था।
हक़ीक़त से ख़याल अच्छा है बेदारी से ख़्वाब अच्छा,
तसव्वुर में वो कैसा सामना होने से पहले था।
अगर मादूम को मौजूद कहने में तअम्मुल है,
तो जो कुछ भी यहाँ है आज क्या होने से पहले था।
किसी बिछड़े हुए का लौट आना ग़ैर-मुमकिन है,
मुझे भी ये गुमाँ इक तजरबा होने से पहले था।
'शऊर' इस से हमें क्या इंतिहा के बा'द क्या होगा,
बहुत होगा तो वो जो इब्तिदा होने से पहले था।।
ये मत पूछो कि कैसा आदमी हूँ,
करोगे याद, ऐसा आदमी हूँ।
मिरा नाम-ओ-नसब क्या पूछते हो!
ज़लील-ओ-ख़्वार-ओ-रुस्वा आदमी हूँ।
तआ'रुफ़ और क्या इस के सिवा हो,
कि मैं भी आप जैसा आदमी हूँ।
ज़माने के झमेलों से मुझे क्या,
मिरी जाँ! मैं तुम्हारा आदमी हूँ।
चले आया करो मेरी तरफ़ भी!
मोहब्बत करने वाला आदमी हूँ।
तवज्जोह में कमी बेशी न जानो,
अज़ीज़ो! मैं अकेला आदमी हूँ।
गुज़ारूँ एक जैसा वक़्त कब तक,
कोई पत्थर हूँ मैं या आदमी हूँ।
'शऊर' आ जाओ मेरे साथ, लेकिन!
मैं इक भटका हुआ सा आदमी हूँ।।
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