सांसदों को कितनी सैलरी मिलती है? संसद का पूरा खर्च जानकर चौंक जाएंगे!

देश की सबसे बड़ी पंचायत...संसद...जहां बैठकर देश के भविष्य के फैसले लिए जाते हैं...जहां कानून बनते हैं...जहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि देश के 140 करोड़ लोगों की आवाज उठाते हैं...लेकिन हर बार सत्र की शुरुआत होते ही संसद के अंदर ऐसा हंगामा होता है कि सवाल खड़े हो जाते हैं कि आखिर सदन क्यों नहीं चल रहा? विपक्ष सरकार से जवाब क्यों मांग रहा है? सरकार विपक्ष पर सदन रोकने का आरोप क्यों लगा रही है? और सबसे बड़ा सवाल...जब संसद का एक-एक मिनट जनता के टैक्स के पैसे से चलता है...तो हंगामे में जब सदन ठप होता है, उसका नुकसान कितना होता है? साथ ही...क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे सांसदों को कितना वेतन मिलता है? उन्हें कौन-कौन सी सुविधाएं मिलती हैं? क्या संसद में आने के लिए अलग पैसा मिलता है? और देश की सबसे बड़ी राजनीतिक संस्था को चलाने में आखिर कितना खर्च आता है? आज की इस खास रिपोर्ट में समझेंगे संसद का पूरा गणित...सांसदों की सैलरी से लेकर सुविधाओं तक...और हंगामे की वजह से होने वाले नुकसान तक...

आपको बता दें संसद का यह मानसून सत्र 20 जुलाई 2026 से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा। इस दौरान कुल 19 बैठकें होनी हैं और मोदी सरकार 17 अहम विधेयक सदन के पटल पर लाने की तैयारी में है। लेकिन जैसे ही पहले दिन की घंटी बजी, शांति की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर गया! लोकसभा हो या राज्यसभा, दोनों सदनों का नजारा किसी जंग के मैदान जैसा नजर आया। विपक्षी सांसद हाथों में तख्तियां, बैनर और पोस्टर लेकर वेल में कूद पड़े। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने नीट परीक्षा घोटाले को लेकर सीधे सरकार की घेराबंदी कर दी। लोकसभा में भी मंजर अलग नहीं था। गजब की बात तो यह रही कि इसी भयंकर शोर-शराबे और नारेबाजी के बीच कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया। आगे चलकर 3 अगस्त को हंगामे के बीच ही लोकसभा से सुप्रीम कोर्ट संशोधन विधेयक 2026 और राज्यसभा से 'MSME विकास संशोधन विधेयक 2026' जैसे बिल पास भी करा लिए गए! 

अब सबसे बड़ा सवाल उठता है कि आखिर संसद चल क्यों नहीं पा रही है? आपको इसे समझने के लिए किसी पीएचडी की जरूरत नहीं है, अपने मोहल्ले या घर के झगड़े से समझ लीजिए! जी हां मामला बिल्कुल वैसा ही है जैसे घर में दो लोग किसी बात पर अड़ जाएं। विपक्ष का कहना है "पहले हमारी सुनो! जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर है, तो सरकार पहले पेपर लीक पर जवाब दे, बाकी काम बाद में होगा।" वहीं सरकार का कहना है "हम चर्चा से भाग नहीं रहे, लेकिन विपक्ष का तरीका गलत है। पहले तय एजेंडे के हिसाब से विधायी काम होने दो, फिर शांति से बहस कर लेना।" जहां विपक्ष इसे जनता के मुद्दे उठाना बता रहा है, तो सरकार इसे बिना किसी ठोस वजह के कामकाज रोकना करार दे रही है। इसी पहले तुम-पहले तुम की जिद में संसद का कीमती समय केवल और केवल हंगामे की भेंट चढ़ रहा है। जहां जब दोनों अपनी बात पर अड़ जाते हैं तो बैठक रुक जाती है। आपको बता दे संसद में भी कई बार यही स्थिति बनती है। विपक्ष चाहता है कि उसके मुद्दों पर तुरंत चर्चा हो। सरकार चाहती है कि पहले विधायी काम पूरे हों। लेकिन जब बहस की जगह नारेबाजी और हंगामा ज्यादा हो जाता है तो नुकसान जनता का होता है। क्योंकि...बिल अटक जाते हैं। सरकार से सवाल पूछने का समय कम हो जाता है। और कानून बनाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

अब आइए उस बात पर, जो सीधे आपके बटुए और आपकी जेब से जुड़ी है! क्या आप जानते हैं कि संसद कोई राजनीतिक दल अपने फंड से नहीं चलाता? संसद भवन के रखरखाव से लेकर, एसी के बिल, वहां का स्टाफ और आपके सांसदों के शाही ठाट-बाट का पूरा खर्च देश का खजाना उठाता है...यानी सीधे तौर पर आपका और हमारा टैक्स! जब संसद में हंगामा होता है और कार्यवाही स्थगित होती है, तो यह मान लीजिए कि जनता के करोड़ों रुपये सीधे नाले में बहा दिए गए! क्योंकि संसद चले या न चले, हर मिनट का मीटर चालू रहता है। जिस तरह किसी घर का खर्च घर की आमदनी से चलता है...ठीक उसी तरह संसद का खर्च देश की आर्थिक व्यवस्था से चलता है। 

आइए, अब आपको बताते हैं कि देश के एक सांसद पर हर महीने कितना खर्च होता है और किस पार्टी के सांसदों पर कितना बजट जाता है! संसद के कानून के मुताबिक, एक सांसद को हर महीने एक लाख रुपये का बेसिक वेतन यानी मूल वेतन मिलता है। लेकिन बात सिर्फ एक लाख पर खत्म नहीं होती! इसके साथ जुड़ते हैं भारी-भरकम भत्ते, जैसे...

निर्वाचन क्षेत्र भत्ता-जिसका इस्तेमाल सांसद अपने क्षेत्र में जनता से जुड़े कामों और कार्यालय संचालन के लिए करते हैं।
कार्यालय खर्च भत्ता-जिससे स्टाफ, स्टेशनरी, फोन और कार्यालय की जरूरतें पूरी की जाती हैं।
यात्रा सुविधा-जिसमें नियमों के अनुसार रेल और हवाई यात्रा जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं।
दिल्ली में रहने की सुविधा-सांसदों को सरकारी आवास उपलब्ध कराया जाता है।
इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाएं भी मिलती हैं।

अगर वेतन और प्रमुख मासिक भत्तों को जोड़ दिया जाए, तो औसतन प्रति सांसद हर महीने लगभग 2 लाख 86 हजार रुपये का खर्च आता है! वहीं अब बात करते हैं लोकसभा की ताकत की यानि बड़ी पार्टियों के हिसाब से इस खर्च का गणित समझिए। लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद भारतीय जनता पार्टी के हैं।

BJP-240 सांसद
कांग्रेस-98 सांसद
समाजवादी पार्टी-37 सांसद

अगर एक सांसद के वेतन और प्रमुख मासिक भत्तों को लगभग 2 लाख 86 हजार रुपये मानें, तो अनुमान के हिसाब से...

BJP के 240 सांसदों पर करीब 6 करोड़ 86 लाख रुपये प्रति महीना।
कांग्रेस के 98 सांसदों पर करीब 2 करोड़ 80 लाख रुपये प्रति महीना।
समाजवादी पार्टी के 37 सांसदों पर करीब 1 करोड़ 5 लाख रुपये प्रति महीना खर्च होते हैं।

यह सिर्फ वेतन और प्रमुख भत्तों का अनुमान है। यानी जिस पार्टी के जितने ज्यादा सांसद, सरकारी खजाने से उस पार्टी के सांसदों पर उतना ही बड़ा बजट खर्च होता है! वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक बहस में कई बार यह सवाल भी उठता है कि क्या विपक्षी नेताओं के विदेश दौरे के बाद संसद में ज्यादा आक्रामक रुख दिखाई देता है? क्योंकि जब-जब राहुल गांधी या अखिलेश यादव सदन के सत्र से पहले विदेश के दौरे पर जाते हैं तो सदन की कार्यवाही हमेशा बाधित होती है। सरकार बहस के लिए तैयार भी रहती है लेकिन विपक्ष किसी न किसी बहाने से सदन को नहीं चलने देता है, जिसका सबसे ज्यादा नुकसार आम जनता का होता है। उसकी गाढ़ी कमाई को पानी की तरह ये सांसद बहा देते हैं। ऐसे में जनता का सवाल है कि क्या इसके लिए सांसदों पर या विपक्ष पर कार्यवाही नहीं होनी चाहिए, उनके वेतन में और सुविधाओं में कटौती नहीं की जानी चाहिए। क्योंकि जैसे एक आम आदमी जब अपनी नौकरी पर नहीं जाता है या उस दिन ठीक से काम नहीं करता है तो, कंपनी उसका एक दिन का वेतन काट लेती है। तो क्या ऐसी कार्रवाई सांसदों पर नहीं होनी चाहिए, हमेशा एक आदमी ही नियमों के दल-दल में क्यों फंसता है। ये बड़ा सवाल है। 

तो कुल मिलाकर कहानी साफ है कि संसद सिर्फ एक इमारत नहीं है। यह देश के लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच है। यहीं जनता के मुद्दे उठते हैं। यहीं कानून बनते हैं। यहीं सरकार से सवाल पूछे जाते हैं। ऐसे में विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह जनता की आवाज उठाए और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह जवाब दे। लेकिन जब बहस की जगह हंगामा ज्यादा हो जाता है...तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं...बल्कि उस जनता का होता है जिसने अपने प्रतिनिधि चुनकर संसद भेजे हैं। क्योंकि संसद का हर मिनट...हर सुविधा...और हर खर्च...आखिरकार जनता के पैसे से चलता है। ऐसे में अब सवाल यही है कि क्या अगली कार्यवाही में सत्ता और विपक्ष टकराव छोड़कर जनता के मुद्दों पर चर्चा करेंगे? या फिर संसद का मानसून सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ता रहेगा? 

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