2315 करोड़ के साइबर घोटाले में उद्योगपति की बड़ी गिरफ्तारी

कभी अपनी बिज़नेस सूझ-बूझ के लिए 'टर्नअराउंड टाइकून' कहे जाने वाले पवन रुइया आज सलाखों के पीछे हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट से मिली 'सुरक्षा की ढाल' गिरते ही बंगाल पुलिस ने वो शिकंजा कसा कि बड़े-बड़े सूरमा दंग रह गए। शेल कंपनियां, क्रिप्टो वॉलेट्स का मायाजाल और डिजिटल अरेस्ट का खौफ पवन रुइया पर लगे आरोपों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि सुनकर सिर चकरा जाए। 1,000 से ज्यादा लोगों की खून-पसीने की कमाई को 'ब्लैक से व्हाइट' करने के इस खेल का अंत अब एक वीआईपी होटल के बाहर गिरफ्तारी से हुआ है। आइए देखते हैं कैसे बिछाया गया था यह डिजिटल ठगी का जाल!

दो साल से पुलिस की रडार पर चल रहे उद्योगपति पवन रुइया की मुश्किलें तब चरम पर पहुंच गईं जब कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें और उनके परिवार को मिली अंतरिम सुरक्षा (Interim Protection) को हटा दिया। सुरक्षा हटते ही पश्चिम बंगाल पुलिस एक पल की भी देरी करने के मूड में नहीं थी। बिधाननगर और बैरकपुर साइबर क्राइम पुलिस की टीम ने जाल बिछाया और कोलकाता के बाहरी इलाके न्यू टाउन स्थित वेस्टिन होटल के बाहर से पवन रुइया को दबोच लिया। कभी करोड़ों की कंपनियों को फिर से जिंदा करने वाले इस टाइकून की गिरफ्तारी ने कॉरपोरेट जगत में हलचल मचा दी है। पुलिस की एफआईआर के मुताबिक, यह कोई मामूली धोखाधड़ी नहीं थी। यह 2024 की शुरुआत से चल रहा एक सुव्यवस्थित सांगठनिक अपराध था। इसमें तीन स्तरों पर खेल खेला जा रहा था:

डिजिटल अरेस्ट और फेक इन्वेस्टमेंट: पूरे देश में मासूम लोगों को डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर या फर्जी निवेश स्कीमों के नाम पर ठगा गया।

शेल कंपनियों का जाल: ठगी के पैसे को ठिकाने लगाने के लिए फर्जी बैंक खातों और शेल कंपनियों का एक जटिल नेटवर्क तैयार किया गया।

क्रिप्टो वॉलेट: पकड़े जाने से बचने के लिए पैसे को क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर मनी लॉन्ड्रिंग की गई।

NCRP (नेशनल साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल) के डेटा ने इस स्कैम की भयावहता को उजागर किया है। 31 अक्टूबर 2025 तक के रिकॉर्ड बताते हैं कि पवन रुइया और उनके साथियों का नाम देश भर में साइबर फ्रॉड के 1,379 मामलों से जुड़ा था। इस रैकेट ने देशभर के लोगों को करीब 2,315 करोड़ रुपये का चूना लगाया है। जांच का असली मोड़ नवंबर 2025 में आया, जब दिल्ली से रुइया के एक करीबी को गिरफ्तार किया गया। उस गिरफ्तारी ने वो धागा पकड़ाया जिससे रुइया ग्रुप के चेयरमैन, उनके बेटे राघव और बेटी पल्लवी तक पुलिस की पहुंच आसान हो गई।
पवन रुइया का नाम पहली बार 1993 में तब चमक था जब उन्होंने 225 साल पुरानी सरकारी कंपनी जेसॉप एंड कंपनी को खरीदकर सबको चौंका दिया था। उन्हें खस्ताहाल कंपनियों को उबारने के लिए जाना जाता था, लेकिन विवादों से उनका पुराना नाता रहा है। 2016: इंडियन रेलवे से जुड़े 50 करोड़ रुपये की जालसाजी और चोरी के मामले में भी वह गिरफ्तार हो चुके हैं। अब उन पर धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश के गंभीर आरोप हैं। हाई कोर्ट द्वारा पिछले साल दी गई अग्रिम जमानत रद्द होना उनकी ताबूत में आखिरी कील साबित हुई।

एक समय जो शख्स बंगाल की मरती हुई कंपनियों के लिए 'मसीहा' बनकर उभरा था, आज वह देश के सबसे बड़े साइबर फ्रॉड नेटवर्क के मुख्य किरदारों में से एक बनकर उभरा है। डिजिटल इंडिया के दौर में डिजिटल ठगी का यह इतना बड़ा साम्राज्य कैसे खड़ा हुआ, यह जांच का विषय है। लेकिन पवन रुइया की गिरफ्तारी ने एक कड़ा संदेश दिया है कानून के हाथ चाहे जितने भी लंबे हों, डिजिटल दुनिया के अपराधी उनसे बच नहीं सकते। अब देखना यह है कि पुलिस रुइया के उन बेटों और बेटियों तक कब पहुंचती है, जिन पर भी इस काले कारोबार में शामिल होने का आरोप है।

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