पीडीए बनाम बीजेपी: कांशीराम की विरासत पर सियासत या 2027 का बड़ा दांव?
लखनऊ, उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जैसे‑जैसे स्थानीय और 2027 विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ तेज हो रही हैं, राजनीति के केंद्र में अब कांशीराम की 92वीं जयंती और उनकी विरासत को लेकर सपा‑बीजेपी‑बसपा के बीच सियासी टकराव भी उभरता दिखाई दे रहा है।
शहर के कैसरबाग में आयोजित कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी ने कांशीराम की जयंती को “पीडीए दिवस” के रूप में मनाया — जहां सपा नेताओं ने ‘पीछड़ा‑दलित‑अल्पसंख्यक’ (PDA) गठजोड़ को बहुजन समुदायों के सशक्तिकरण का मुख्य आधार बताया और इसे आगामी चुनाव में अपनी जीत की रणनीति के हिस्से के रूप में पेश किया। सपा महासचिव और प्रमुख नेता ने कहा कि कांशीराम का सामाजिक न्याय और समानता का विजन आज भी प्रासंगिक है, और यही विचार सपा के PDA फॉर्मूले में जीवित है — जो पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को जोड़कर सत्ता तक पहुंचने की मुहिम है।
लेकिन यही अवसर राजनीतिक बयानबाज़ी का मौका भी बन गया। भाजपा और अन्य दलों ने सपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह कांशीराम की विरासत का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है ताकि दलित‑पिछड़ा वोट बैंक को अपने पक्ष में मोड़ा जा सके। बीजेपी की ओर से यह भी कहा गया कि सपा की राजनीति विकास के मुद्दे की बजाय केवल जातीय राजनीतिक समीकरणों पर केंद्रित है, और इससे सामाजिक सदभाव को नुकसान पहुंच सकता है।
इसी बीच, बहुजन समाज पार्टी के नेतृत्व में भी कांशीराम जयंती को दलित वोटरों को एकजुट करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। बसपा ने ‘लखनऊ चलो’ जैसे कार्यक्रमों के ज़रिये अपनी शक्ति दिखाने की कोशिश की, ताकि पार्टी अपने मूल बहुजन समर्थन को फिर से मजबूती दे सके।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कांशीराम की विरासत पर यह सियासत केवल स्मरण और श्रद्धांजलि का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह 2027 विधानसभा चुनाव से पहले की बड़ी राजनीतिक लड़ाई का भी हिस्सा बन गई है — जिसमें सभी प्रमुख दल दलित‑पिछड़ा मतदाताओं तक पहुँचने और अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं।
इस बहस के बीच, कांग्रेस ने भी कदम बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री से कांशीराम को भारतम् रत्न देने की मांग की है, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर भी गरमा गया है।
इस प्रकार, कांशीराम की जयंती आज न सिर्फ एक सामाजिक आदर्श की याद है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारी राजनीतिक रणनीति, बयानबाज़ी और मतदाताओं के लिए संदेशों का एक प्रमुख मोर्चा भी बन चुकी है।

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