मटर की खेती से किसानों को होगा डबल फायदा
कम लागत और कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसलों में मटर किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है। रबी सीजन की शुरुआत के साथ ही किसान ऐसी फसलों की तलाश में रहते हैं, जिनसे कम समय में अच्छी आमदनी हो सके। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, मटर की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता सुधारने में भी अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि किसान इसे आर्थिक लाभ और टिकाऊ खेती के लिहाज से उपयोगी मान रहे हैं।
मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मददगार है मटर की फसल
मटर एक प्रमुख दलहनी फसल है, जिसकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणु पाए जाते हैं। ये जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करने में मदद करते हैं, जिससे जमीन की प्राकृतिक उर्वरता बेहतर होती है। मटर की फसल के बाद गेहूं और मक्का जैसी फसलें उगाने पर भी इसका लाभ मिल सकता है। इससे अगली फसल में नाइट्रोजन उर्वरकों की जरूरत कुछ हद तक कम हो सकती है और किसानों की खेती की लागत घटाने में मदद मिलती है।
60 से 75 दिनों में तैयार हो सकती है अगेती मटर
हरी मटर की बाजार में अच्छी मांग रहती है, खासकर सीजन की शुरुआत में इसकी कीमतें बेहतर मिलने की संभावना होती है। मटर की कुछ अगेती उन्नत किस्में अनुकूल परिस्थितियों में लगभग 60 से 75 दिनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो सकती हैं। ऐसे में किसानों को कम समय में फसल से आमदनी प्राप्त करने का अवसर मिलता है। हालांकि, फसल की अवधि किस्म, मौसम और खेती की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
मटर की खेती से लाखों रुपये तक कमाई की संभावना
सीजन की शुरुआत में हरी मटर के थोक और खुदरा बाजार भाव 60 से 80 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकते हैं, लेकिन वास्तविक कीमत स्थानीय मंडी, मांग और आपूर्ति के अनुसार बदलती रहती है। वैज्ञानिक पद्धति से खेती, उन्नत किस्मों का चयन और सही समय पर तुड़ाई करने से किसानों को बेहतर उत्पादन और मुनाफा मिल सकता है। कुछ परिस्थितियों में प्रति हेक्टेयर 1.5 से 2 लाख रुपये तक शुद्ध मुनाफे का अनुमान लगाया जाता है, लेकिन यह आमदनी सुनिश्चित नहीं है और खेती की लागत, उपज तथा बाजार भाव पर निर्भर करती है।
अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी, बीज और बुवाई का रखें ध्यान
मटर की बेहतर पैदावार के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी का पीएच मान लगभग 6 से 7.5 के बीच होना चाहिए और खेत में जलभराव नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ों में सड़न और अन्य रोगों का खतरा बढ़ सकता है। बुवाई से पहले बीजों का उपयुक्त फफूंदनाशक से उपचार कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करें। सामान्य तौर पर कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 8 से 10 सेंटीमीटर रखी जा सकती है। सही किस्म, संतुलित पोषण और समय पर सिंचाई अपनाकर किसान मटर की खेती से बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।

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