पैलेट गन का सच! किसने दिया फायरिंग का आदेश?

अब हम बात करेंगे उस सियासी तूफान की...जिसने संसद से लेकर सड़क तक...और सोशल मीडिया से लेकर देश की राजनीति तक...हर जगह हलचल मचा दी है। एक तरफ लोकसभा में 'एंटी पेपर लीक बिल' पास हुआ, तो दूसरी तरफ नीट पेपर लीक को लेकर बवाल ऐसा बढ़ा कि दिल्ली की सड़कें रणक्षेत्र बन गईं! संसद के भीतर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का वो तीखा हमला...गृह मंत्री अमित शाह पर सीधे-सीधे सनसनीखेज आरोप...और फिर सत्तापक्ष का जबरदस्त हंगामा! क्या वाकई देश की राजधानी में छात्रों को खदेड़ने के लिए AK-47 तानी गई? क्या सच में निहत्थे छात्रों पर पैलेट गन के छर्रे बरसाए गए? आखिर कौन है वो अफसर, जिसने बटन दबाने या गोली चलाने का हुक्म दिया? कहानी में कई ऐसे मोड़ हैं जो आपको हैरान कर देंगे! देखिए पूरी रिपोर्ट...

खबर की शुरुआत करते हैं लोकसभा के उस बड़े फैसले से, जिसने देश के करोड़ों युवाओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। लोकसभा में 'पब्लिक एग्जामिनेशन संशोधन विधेयक, 2026' ध्वनिमत से पास हो गया है। बिल पास होते ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करके देश के छात्रों को बधाई दी। अमित शाह ने साफ शब्दों में लिखा कि यह नया कानून उन लोगों के लिए सबसे कठोर सजा का इंतजाम करता है जो सार्वजनिक परीक्षाओं की पवित्रता से खिलवाड़ करने की हिम्मत करते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार युवाओं के सपनों और आकांक्षाओं की ढाल बनकर खड़ी है और छात्रों के भविष्य से खेलने वाले किसी भी गुनहगार को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन, दूसरी तरफ संसद के भीतर का माहौल इतना सीधा नहीं था। 

बिल पर चर्चा के दौरान केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने विपक्ष पर करारा हमला बोलते हुए कहा कि इतने संवेदनशील और जरूरी मुद्दे पर ठोस सुझाव देने के बजाय विपक्ष सिर्फ और सिर्फ राजनीति चमकाने में लगा है। वहीं असली गदर तब मचा जब दिल्ली की सड़कों पर नीट पेपर लीक के खिलाफ उतरे छात्रों के प्रदर्शन और उन पर हुई पुलिस कार्रवाई का मुद्दा संसद में गूंजा। दरअसल, 20 जुलाई को जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर कई छात्र संगठनों और कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद' मार्च के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच भारी झड़प हुई थी। जहां लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सीधा गृह मंत्री अमित शाह को घेर लिया। राहुल गांधी ने संसद में खड़े होकर बेहद गंभीर आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोली और पैलेट गन चलाने का आदेश सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ही दिया था! 

वहीं राहुल के इस बयान के आते ही सत्तापक्ष के सांसद भड़क उठे। बीजेपी सांसदों ने भारी हंगामा शुरू कर दिया और राहुल गांधी से फौरन माफी मांगने की मांग की। हालांकि, हंगामे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ने अमित शाह को लेकर दिए गए राहुल गांधी के उस बयान को संसद की कार्यवाही से हटा दिया। उधर, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी राहुल गांधी के समर्थन में उतर आए। अखिलेश यादव ने कहा कि अगर देश का नेता प्रतिपक्ष इतना बड़ा आरोप लगा रहा है, तो सरकार को छिपने के बजाय सामने आकर जवाब देना चाहिए कि आखिर छात्रों पर बल प्रयोग का हुक्म किसने दिया था। 

आपको बता दें शुरुआत में तो प्रशासन और दिल्ली पुलिस इस बात से साफ मुकरते रहे कि प्रदर्शन में पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ है। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सीपी देवेश चंद श्रीवास्तव ने साफ कहा था कि दिल्ली पुलिस के पास पैलेट गन होती ही नहीं है। लेकिन जब घायल छात्र, जैसे 19 साल का साहिल, लेडी हार्डिंग और सफदरजंग अस्पताल पहुंचे और उनकी मेडिकल रिपोर्ट में छर्रों के घाव मिलने का दावा हुआ, तो हड़कंप मच गया। राहुल गांधी खुद एक घायल छात्र को मीडिया के सामने ले आए। 

वहीं मामला बढ़ता देख CRPF हरकत में आई। क्योंकि रैपिड एक्शन फोर्स CRPF की ही एक विंग है, इसलिए सीआरपीएफ महानिदेशक जीपी सिंह के निर्देश पर आईजी स्तर के अधिकारी को पूरे मामले की जांच सौंपी गई है। सूत्रों के मुताबिक, पैलेट गन चलाने वाले जवानों की पहचान कर ली गई है और जांच टीम की रिपोर्ट बहुत जल्द सामने आने वाली है। इस बीच CRPF के डीजी जीपी सिंह ने स्थापना दिवस के मौके पर अपने जवानों का हौसला बढ़ाते हुए बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रहित और जनहित में निडर होकर ड्यूटी निभाएं, जवान जो भी फैसला लेंगे, बतौर डीजी वे उसकी पूरी जिम्मेदारी और जवाबदेही अपने कंधों पर लेने को तैयार हैं। 

वहीं अब आते हैं उस सवाल पर कि पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया? दरअसल, अब सबसे बड़ा पेंच इस बात पर फंसा है कि आखिरकार ट्रिगर दबाने का लिखित या मौखिक आदेश किसने दिया? 22 जुलाई को संसद मार्ग थाने में दर्ज जनरल डायरी के मुताबिक, RAF के एक डिप्टी कमांडेंट ने सूचना दर्ज कराई थी कि 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस के एक DCP स्तर के अधिकारी के निर्देश पर RAF ने 55 नॉन-इलेक्ट्रिक शेल्स, 15 इलेक्ट्रिक शेल्स, 5 आंसू गैस के गोले और 2 राउंड पैलेट गन से गोलियां दागीं। RAF का दावा है कि उन्होंने SOP का पूरा पालन किया। पहले चेतावनी दी गई, फिर लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल हुआ, और जब भीड़ संसद की तरफ बढ़ने लगी तब मजबूरी में कम घातक प्लास्टिक छर्रों वाली पैलेट गन चलाई गई। लेकिन यहाँ एक नया मोड़ आ गया है! 

दिल्ली पुलिस और RAF अब इस मुद्दे पर एक-दूसरे के सामने आ खड़े हुए हैं। दिल्ली पुलिस के सूत्रों का कहना है कि जिस DCP पर आदेश देने का आरोप लग रहा है, उनके पास इस बात के सबूत हैं कि उन्होंने कभी पैलेट गन चलाने की इजाजत ही नहीं दी थी! पुलिस अधिकारियों का आरोप है कि RAF के एक अफसर ने खुद फैसला लिया और अब जब बवंडर खड़ा हो गया है, तो दो दिन बाद जीडी एंट्री करवाकर ठीकरा दिल्ली पुलिस के सिर फोड़ने की कोशिश की जा रही है। कुल मिलाकर, कुल 5 गोलियां चलने की बात कही जा रही है। 2 गोलियां ज़ोन-1 में चलीं, लेकिन बाकी 3 गोलियां किस ज़ोन में चलीं और किस अफसर के कहने पर चलीं, इसकी गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझती जा रही है।

आपको बता दें पैलेट गन एक विशेष प्रकार का नॉन-लीथल यानी गैर-घातक भीड़ नियंत्रण हथियार है, जिसका इस्तेमाल सुरक्षा बल अनियंत्रित हिंसक भीड़ को रोकने के लिए करते हैं। यह शॉटगन की तरह काम करती है। इसके एक कारतूस से सीसे या रबर के सैकड़ों छोटे-छोटे गोल छर्रे तेजी से बाहर निकलते हैं और हवा में फैल जाते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि छर्रों के दर्द से प्रदर्शनकारियों को पीछे धकेलना होता है। लेकिन अगर इसे पास से या शरीर के ऊपरी हिस्सों खासकर चेहरे और आंखों पर दागा जाए तो यह त्वचा को चीर देती है और इंसान हमेशा के लिए अंधा हो सकता है या उसकी जान भी जा सकती है। अब आते हैं उस सवाल पर कि पैलेट गन कब चलाना चाहिए और कब नहीं? 

तो आपको बता दें मानवाधिकारों और गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस के अनुसार पैलेट गन के उपयोग को लेकर कड़े नियम तय हैं। जब भीड़ अत्यधिक हिंसक हो जाए, पथराव, आगजनी करे और वॉटर कैनन, आंसू गैस या लाठीचार्ज जैसे उपाय विफल हो जाएं, तो इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। पैलेट गन हमेशा कमर के नीचे पैरों पर निशाना साधकर ही चलाई जानी चाहिए ताकि गंभीर चोट न लगे। वहीं शांतिपूर्ण या निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर इसका उपयोग सख्त मना है। चेहरे, छाती या आंख का सीधा निशाना बनाकर इसे दागना गैर-कानूनी है। 

तो कुल मिलाकर...एंटी पेपर लीक संशोधन विधेयक भले ही संसद से पास हो गया हो...लेकिन उससे कहीं बड़ी बहस अब छात्रों पर हुई कार्रवाई, पैलेट गन के इस्तेमाल और जवाबदेही की बन चुकी है। एक तरफ सरकार कह रही है कि नया कानून युवाओं के भविष्य की सुरक्षा करेगा और पेपर लीक माफिया पर सबसे बड़ी चोट साबित होगा। दूसरी तरफ विपक्ष का आरोप है कि जब युवा अपने भविष्य के लिए सड़क पर उतरे...तो उन्हें जवाब देने की बजाय उन पर बल प्रयोग किया गया। 

वहीं इस पूरे मामले में कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी भी देश जानना चाहता है। क्या वास्तव में पैलेट गन का इस्तेमाल पूरी तरह नियमों के तहत हुआ? क्या आदेश लिखित था या मौखिक? क्या संसद में लगाए गए आरोप सिर्फ राजनीति हैं...या जांच के बाद कोई नई तस्वीर सामने आएगी? फिलहाल इतना तय है कि यह मामला अब सिर्फ पेपर लीक तक सीमित नहीं रहा। यह लोकतंत्र, विरोध के अधिकार, कानून-व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक जवाबदेही का सबसे बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। अब पूरे देश की नजरें CRPF की जांच रिपोर्ट...संसद में सरकार के अगले जवाब... और इस पूरे विवाद के राजनीतिक अंजाम पर टिकी हैं। 

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