खेती में इस्तेमाल हो रहे खतरनाक रसायन, सेहत पर मंडरा रहा खतरा

भारतीय परिवारों को उम्मीद होती है कि घर का खाना सेहत बनाए रखेगा, लेकिन कृषि में इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायन चिंता का कारण बन रहे हैं। कृषि मंत्रालय के दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 2020 में विशेषज्ञों ने 27 हानिकारक रसायनों के सुरक्षित विकल्प मौजूद होने की बात कही थी। इन रसायनों को कैंसर, भ्रूण को नुकसान और बच्चों के मानसिक विकास पर असर जैसे खतरों से जोड़ा गया है। इसके बावजूद 2023 में केवल तीन रसायनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया, जबकि कई अन्य रसायन अब भी सीमित नियमों के साथ बाजार में उपलब्ध हैं।

सस्ते रसायनों के कारण किसान मजबूर

इन खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल की बड़ी वजह उनकी कम कीमत है। पुराने जेनेरिक कीटनाशक एक एकड़ खेती में करीब 150 से 250 रुपये तक खर्च में मिल जाते हैं, जबकि सुरक्षित जैविक विकल्पों की लागत 800 से 1500 रुपये तक पहुंच जाती है। देश के अधिकांश छोटे और सीमांत किसान कम लागत के कारण पुराने रसायनों को चुनने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि किसानों को सुरक्षित विकल्पों पर सहायता और सब्सिडी उपलब्ध कराई जाए।

कॉर्पोरेट दबाव और नीतियों पर सवाल

भारत का पेस्टिसाइड बाजार आज भी पुराने और विवादित रसायनों पर काफी निर्भर है। जब सरकार ने 27 रसायनों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव रखा तो एग्रो-केमिकल उद्योग ने आर्थिक नुकसान और रोजगार प्रभावित होने का तर्क दिया। इसके बाद कई रसायनों पर पूरी रोक लगाने के बजाय आंशिक प्रतिबंध लगाए गए। इससे यह सवाल उठता है कि क्या आर्थिक हितों को लोगों की सेहत से ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है।

कई खतरनाक रसायन अब भी बाजार में

मोनोक्रोटोफॉस, क्लोरपायरीफॉस, कार्बोफ्यूरान, ऐसफेट, मैनकोजेब और अन्य कई रसायनों को लेकर स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी चिंताएं जताई जाती रही हैं। कई देशों में इन पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, लेकिन भारत में इनका इस्तेमाल कुछ फसलों में जारी है। ग्लाइफोसेट और पैराक्वाट जैसे खरपतवारनाशक भी लंबे समय से विवादों में हैं और इनके सुरक्षित विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद इनकी बिक्री पर सवाल उठ रहे हैं।

लेबल क्लेम से नहीं सुलझ रही समस्या

खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल को सीमित करने के लिए सरकार ने कई जगह 'लेबल क्लेम' नियम लागू किए, जिसके तहत कुछ फसलों में इनके उपयोग पर रोक लगाई गई। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कागजी प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत है कि सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए, किसानों को जागरूक किया जाए और मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए ठोस नीतियां बनाई जाएं।

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