झूठ से लंबी नाक तक: क्यों पिनोकियो आज भी बच्चों का प्यारा किरदार है?

अगर झूठ बोलते ही हमारे चेहरे पर उसकी निशानी उभर आए, तो शायद झूठ बोलना उतना आसान नहीं रहेगा। पिनोकियो की कहानी इसी कल्पना को एक यादगार रूप देती है। जैसे ही वह झूठ बोलता है, उसकी नाक बढ़ने लगती है। यही असाधारण विशेषता उसे विश्व साहित्य के सबसे पहचाने जाने वाले बाल पात्रों में शामिल करती है।

इतालवी लेखक कार्लो कोलोडी की रचना द एडवेंचर्स ऑफ पिनोकियो पहली बार 1881 में धारावाहिक के रूप में सामने आई और 1883 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। कहानी का केंद्र एक लकड़ी की कठपुतली है, लेकिन पिनोकियो को केवल कठपुतली समझना उसके चरित्र को सीमित कर देना होगा। उसके पीछे एक पिता है—जेपेट्टो—जो लकड़ी से उसे गढ़ने के बावजूद उसे वस्तु नहीं, अपनी संतान की तरह देखता है।

पिनोकियो का व्यक्तित्व शुरू से ही बेचैन और विद्रोही है। उसके शरीर का हर नया अंग जैसे उसके भीतर की स्वतंत्र इच्छा को भी जन्म देता है। मुंह बनते ही वह बोलने लगता है और पैर बनते ही अपनी राह पर भाग पड़ता है। वह पिता की सीख को नजरअंदाज करता है, स्कूल से बचना चाहता है और हर नए आकर्षण के पीछे चल पड़ता है।

यही वजह है कि पिनोकियो किसी आदर्श बच्चे की तस्वीर नहीं है। वह जिद्दी है, लालच में आ जाता है, दूसरों के बहकावे में आसानी से फंस जाता है और कई बार अपनी गलतियों को दोहराता भी है। लेकिन उसकी यही कमियां उसे वास्तविक बनाती हैं। बचपन अक्सर इसी तरह का होता है—जिज्ञासा से भरा, अनुभवहीन और नियमों को चुनौती देने वाला।

कोलोडी ने पिनोकियो को एक ऐसी दुनिया में रखा है जहां रोमांच के साथ धोखा और खतरा भी मौजूद है। कठपुतलियों का रंगमंच, चालाक लोमड़ी और बिल्ली, बोलने वाला झिंगुर, रहस्यमयी नीली परी, जेल और अदालत जैसे प्रसंग उसकी यात्रा को केवल बाल-कथा नहीं रहने देते। हर घटना पिनोकियो को किसी न किसी अनुभव से गुजराती है।

उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह जिम्मेदारियों से बचना चाहता है। पढ़ाई और मेहनत उसे बोझ लगती है और वह ऐसी जिंदगी चाहता है जिसमें सिर्फ आनंद हो और कोई रोक-टोक न हो। लेकिन उसकी नाक उसके लिए एक तरह का नैतिक आईना बन जाती है। वह अपने झूठ को छिपा नहीं सकता। हर असत्य उसके चेहरे पर दिखाई देने लगता है।

समय के साथ पिनोकियो को यह समझ आने लगती है कि उसके फैसलों का असर केवल उस पर नहीं, उसके पिता पर भी पड़ता है। जब उसे मालूम होता है कि जेपेट्टो ने उसकी किताबें खरीदने के लिए अपना कोट तक बेच दिया था, तब उसके भीतर बदलाव की शुरुआत होती है। पहली बार वह अपनी इच्छाओं से आगे बढ़कर पिता की जरूरत और भावनाओं को समझने लगता है।

यहीं पिनोकियो की कहानी का असली अर्थ सामने आता है। उसकी महानता इस बात में नहीं है कि वह कभी गलती नहीं करता। बल्कि वह इसलिए याद रहता है क्योंकि गलतियों और अनुभवों के जरिए धीरे-धीरे खुद को बदलता है। वह हमें याद दिलाता है कि गलती इंसान की कमजोरी हो सकती है, लेकिन गलती को स्वीकार करके उससे सीखना उसके चरित्र की मजबूती है।

शायद इसी कारण पिनोकियो आज भी इतना प्रिय है। वह किसी पूर्ण बच्चे का चित्र नहीं, बल्कि उस बच्चे का रूपक है जो गिरता है, भटकता है, बहकता है और अंततः अपने अनुभवों से समझदार बनता है। उसकी लंबी नाक केवल झूठ की सजा नहीं, बल्कि आत्मबोध की ओर ले जाने वाला संकेत भी है।

आखिरकार, बचपन सीखने की एक प्रयोगशाला है। गलतियां उस सीख का जरूरी हिस्सा हैं। पिनोकियो की यात्रा हमें यही बताती है कि अच्छा बनना जन्म से तय नहीं होता—कई बार अपनी गलतियों को पहचानते हुए धीरे-धीरे अच्छा बनना पड़ता है।

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.