PM मोदी का ‘दिमागी नक्सल’ दांव, कांग्रेस के पुराने बयानों से क्यों जुड़ा विवाद?

15 अगस्त...लाल किले की प्राचीर...देशभक्ति का माहौल...और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के नाम संबोधन! हर बार की तरह देश को उम्मीद थी कि लाल किले से योजनाओं की बौछार होगी, बड़ी-बड़ी उपलब्धियों का लेखा-जोखा सामने आएगा... और हुआ भी वही। लेकिन, इस बार प्रधानमंत्री के भाषण में सिर्फ अपनी सरकार की पीठ थपथपाने वाली बातें नहीं थीं। इस बार लाल किले की प्राचीर से गूंजी एक ऐसी चेतावनी, जिसने देश के सियासी पारे को एकदम सातवें आसमान पर पहुंचा दिया! प्रधानमंत्री ने सरेआम ऐलान किया कि भारत ने जंगलों और पहाड़ों में छिपे हथियारबंद नक्सलवाद की कमर तो तोड़ दी है, लेकिन... अब देश के सामने एक नया और बेहद खतरनाक दुश्मन खड़ा हो रहा है! और उस दुश्मन को नाम दिया गया....‘दिमागी नक्सल’! जी हां, 'दिमागी नक्सल'! एक ऐसा शब्द, जिसने आते ही पूरी सियासत में भूचाल ला दिया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर प्रधानमंत्री को इस सख्त शब्द का इस्तेमाल क्यों करना पड़ा? आइए जानते हैं। 

लाल किले से प्रधानमंत्री का संदेश बिल्कुल आईने की तरह साफ था। भारत ने गोलियों और बम-बारूद वाले नक्सलवाद से दशकों तक जंग लड़ी है। सुरक्षा बलों के जवानों ने अपनी शहादत देकर लाल गलियारे को लगभग समेट दिया है। इस मोर्चे पर देश को बहुत बड़ी कामयाबी मिली है। लेकिन प्रधानमंत्री ने जो घंटी बजाई है, वो लाल किले से बहुत दूर तक सुनाई दे रही है। खतरा सिर्फ उस नक्सली से नहीं होता जो हाथ में AK-47 लेकर जंगल में छिपा है...असली और बड़ा खतरा उस सोच से है जो बिना किसी हथियार के, विचारों के जरिए आपके और हमारे दिमाग में घर कर रही है। वहीं प्रधानमंत्री का इशारा साफ तौर पर उन प्रवृत्तियों की तरफ था, जिनका काम सुबह से शाम तक सिर्फ एक ही है...देश में निराशा फैलाना, संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना और विकास के हर काम पर ब्रेक लगाने की कोशिश करना। इसी खतरनाक सोच के लिए 'दिमागी नक्सल' शब्द अब हर गली-चौराहे और टीवी डिबेट की सबसे बड़ी बहस बन चुका है।

अब यहां एक बात बिल्कुल साफ समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में असहमति की पूरी आजादी है। सरकार की आलोचना कीजिए...सवाल पूछिए...किसी योजना की कमियां बताइए...किसी कानून का विरोध कीजिए...विपक्ष को सरकार की नीतियों पर हमला करने का पूरा अधिकार है। यही तो लोकतंत्र है। लेकिन समस्या वहां शुरू होती है, जब बहस तथ्यों से हटकर सिर्फ अनुमान और आरोपों पर टिक जाए। यानी बात अब सरकार के काम पर सवाल उठाने की नहीं रही, बल्कि विकास की पूरी सोच को ही कटघरे में खड़ा करने की हो गई है। इसी बहस को समझने के लिए बिहार चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार के उस बयान का उदाहरण दिया जाता है, जिसमें उन्होंने राज्य में बन रही सड़कों और हाईवे को बिहार का पानी लूटने के लिए बनाए जाने से जोड़कर सवाल उठाया था। अब जरा ठंडे दिमाग से सोचिए! सड़क आखिर बनती किसलिए है? सड़क एक कटे हुए गांव को मुख्य शहर से जोड़ती है। 

सड़क बनती है तो गांव का छोटा किसान अपनी फसल सीधे बड़ी मंडी में ले जाकर अच्छे दाम पाता है। सड़क होती है तो आधी रात को तड़पते मरीज को लेकर एंबुलेंस समय पर अस्पताल पहुंचती है। सड़क से बड़े-बड़े उद्योग जुड़ते हैं, व्यापार बढ़ता है, बच्चों को बड़े कॉलेजों तक पहुंचने का रास्ता मिलता है और इलाके में रोजगार के नए दरवाजे खुलते हैं। किसी भी राज्य या देश की तरक्की की पहली सीढ़ी वहां का विकास ही होता है। ऐसे में अगर जनता के लिए बन रही बुनियादी सुविधाओं को ही ‘शोषण का जरिया’ और ‘लूट का रास्ता’ बताकर प्रचारित किया जाएगा, तो आम जनता के दिमाग में क्या मैसेज जाएगा? क्या वो इस विकास पर गर्व करेगी या फिर हर नए काम को शक की निगाह से देखने लगेगी? क्या इससे देश आगे बढ़ेगा या फिर लोग अविश्वास के दलदल में धंसते चले जाएंगे? यही वो सबसे बड़ा सवाल है जहां प्रधानमंत्री का ‘दिमागी नक्सल’ वाला बयान आकर खड़ा होता है।

और कहानी सिर्फ सड़कों और हाईवे तक खत्म नहीं होती! कांग्रेस के दिग्गज नेता सैम पित्रोदा के उस बयान को भी देश भूला नहीं है, जिसमें उन्होंने अमेरिका की तर्ज पर 'संपत्ति के पुनर्वितरण' यानी वेल्थ टैक्स की पैरवी की थी। ऊपर-ऊपर से सुनने में यह विचार बड़ा लुभावना लगता है कि अमीर की संपत्ति लो और गरीबों में बांट दो, सब बराबर हो जाएंगे! गरीबी मिट जाएगी! लेकिन अर्थशास्त्र की कड़वी सच्चाई क्या है? कोई भी देश सिर्फ एक की जेब से पैसा निकालकर दूसरे की जेब में डालने से अमीर नहीं बनता। देश में लंबे समय की समृद्धि तब आती है जब देश में नया निवेश आता है, नए कारखाने और उद्योग लगते हैं, नई तकनीक आती है, युवाओं को नौकरियां मिलती हैं, बिजनेस का माहौल बनता है, और सबसे बड़ी बात जब मेहनत करने वाले इंसान को यह भरोसा होता है कि उसकी मेहनत की कमाई सुरक्षित रहेगी!

वहीं अब बात करते हैं आज के भारत की। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में सीना तानकर खड़ा है। देश के कोने-कोने में फोर-लेन और सिक्स-लेन हाईवे का जाल बिछ रहा है। रेलवे का कायाकल्प हो रहा है, वंदे भारत जैसी ट्रेनें दौड़ रही हैं। नए-नए एयरपोर्ट्स बन रहे हैं। डिजिटल इंडिया के मामले में भारत दुनिया को राह दिखा रहा है। मेक इन इंडिया के तहत कारखानों में सामान बन रहा है और लाखों नौकरियां पैदा करने की कोशिश हो रही है। तो क्या इन योजनाओं पर सवाल नहीं उठना चाहिए? बिल्कुल उठना चाहिए! अगर किसी हाईवे को बनाने में किसी गरीब का घर उजड़ रहा है और उसे सही मुआवजा नहीं मिला, तो सवाल उठाइए! अगर रेलवे या एयरपोर्ट के टेंडर में भ्रष्टाचार की बदबू आ रही है, तो सरकार का गला पकड़िए! अगर किसी प्रोजेक्ट से जंगलों और पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, तो चीख-चीखकर विरोध कीजिए! यह सब जनता का अधिकार है। लेकिन, सवाल उठाने और हर काम को नाकार देने में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। किसी योजना की कमियों को उजागर करके उसे बेहतर बनाना एक बात है...और तरक्की के हर काम को ही साजिश बताकर देश को पीछे धकेलने की कोशिश करना बिल्कुल दूसरी बात!

वहीं आप अगर नक्सलवाद का इतिहास उठाकर देख लीजिए तो भारत में नक्सलवाद की शुरुआत कभी सिर्फ बंदूकों से नहीं हुई थी। इसके पीछे एक जहरीली वैचारिक सोच थी, और वो थी, संवैधानिक व्यवस्था को न मानना, अदालतों और पुलिस पर अविश्वास पैदा करना, और देश की चुनी हुई सरकारों के खिलाफ लोगों को भड़काना। लेकिन समय बदला, जवानों ने गोलियां खाईं और जंगलों से हथियारबंद नक्सलियों को खदेड़ दिया। लेकिन पीएम मोदी की चेतावनी का सीधा मतलब यही है कि सिर्फ बंदूक छिन जाने से विचारधारा खत्म नहीं होती। अगर वही सोच नए लिबास में, नए शब्दों के साथ समाज में अविश्वास और अराजकता फैलाएगी, तो देश को उस पर भी नजर रखनी होगी। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि असली लोकतांत्रिक असहमति और देश को अंदर से खोखला करने वाली विनाशकारी सोच के बीच का फर्क समझा जाए। और यह जिम्मेदारी सिर्फ विपक्ष की नहीं है, सत्ता में बैठी सरकार की भी उतनी ही है।

तो कुल मिलाकर बात यही है कि लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस दिमागी नक्सल वाली चेतावनी को सिर्फ एक चुनावी या राजनीतिक बयान मानकर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। किसी भी आलोचक को सिर्फ इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ का थप्पा नहीं लगाया जा सकता क्योंकि उसने सरकार की नाक में दम कर रखा है। आज भारत को एक ऐसा लोकतंत्र चाहिए जहां सवाल भी हों और उनका समाधान भी...जहां नीतियों का विरोध भी हो और देश का विकास भी... 
क्योंकि यह देश सिर्फ पत्थरों, कंक्रीट, सड़कों और पुलों से नहीं बनता...यह देश अपने लोगों के विचारों से बनता है। और अगर लड़ाई विचारों की है, तो उसका जवाब भी कुतर्क से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, मजबूत तर्कों और लोकतांत्रिक संवाद से ही दिया जाना चाहिए। फैसला अब देश की जनता को करना है कि वो देश के निर्माण में भागीदार बनना चाहती है या फिर हर बदलाव को शक की निगाह से देखने वाली सोच का शिकार!

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