बंगाल में 'इश्तेहार' संग्राम: PM मोदी ने कुरेदे 120 साल पुराने ज़ख्म
पश्चिम बंगाल की सियासी बिसात पर इस बार मुद्दा 'रोटी, कपड़ा और मकान' नहीं, बल्कि एक लफ्ज़ बन गया है....'इश्तेहार'। जी हां कूचबिहार की धरती से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब टीएमसी के घोषणापत्र को 'इश्तेहार' कहकर पुकारा, तो बंगाल की राजनीति में भूचाल आ गया। यह बहस अब शब्दकोश से निकलकर इतिहास के उन काले पन्नों तक जा पहुंची है, जिसने 120 साल पुराने जख्मों को कुरेद दिया है। ऐसे में सवाल है कि क्या एक शब्द बंगाल का चुनावी भविष्य तय करेगा? क्या 'इश्तेहार' के पीछे कोई गहरा सियासी खेल है? आइए, इस हाई-वोल्टेज विवाद के पीछे की पूरी कहानी जानते हैं।
दरअसल, विवाद की शुरुआत तब हुई जब पीएम मोदी ने कूचबिहार की रैली में टीएमसी को आड़े हाथों लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी ने जानबूझकर अपने घोषणापत्र के लिए बंगाली शब्द के बजाय 'इश्तेहार' शब्द चुना है। पीएम का तर्क था कि यह बंगाल की महान पहचान को मिटाने और तुष्टिकरण के खेल को आगे बढ़ाने की एक सोची-समझी साजिश है।
आपको बता दें प्रधानमंत्री ने इस विवाद को सिर्फ भाषा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे 1905 के बंगाल विभाजन के इतिहास से जोड़ दिया। उन्होंने जिक्र किया 'लाल इश्तेहार' का। अब आप सोच रहे होंगे कि ये लाल इश्तेहार क्या था? तो आपको बता दें इतिहासकारों के अनुसार, 1905-1907 के दौरान इब्राहिम खान नामक व्यक्ति ने एक पर्चा जारी किया था, जिसे 'लाल इश्तेहार' कहा गया। यह ढाका के नवाब के प्रभाव वाले इलाकों में बांटा गया था। वहीं पीएम मोदी और बीजेपी का दावा है कि उस वक्त इस 'इश्तेहार' के जरिए हिंदुओं के खिलाफ नफरत फैलाई गई और सांप्रदायिक हिंसा को भड़काया गया। पीएम ने कहा कि टीएमसी 'इश्तेहार' शब्द का इस्तेमाल कर उसी दौर की याद दिलाना चाहती है और बंगाल की संस्कृति को नष्ट करना चाहती है। वहीं बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने इसमें घी डालने का काम करते हुए पूछा कि क्या यह बांग्ला का मूल शब्द है? उन्होंने इसे फारसी और उर्दू से जोड़ते हुए टीएमसी की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए।
वहीं टीएमसी ने पीएम के इस वार पर पलटवार करते हुए जवाब दिया है। बेलेघाटा से उम्मीदवार कुणाल घोष ने तो यहां तक कह दिया कि पीएम को मातृभाषा का सम्मान करना नहीं आता और वे बंगाल का अपमान कर रहे हैं। वहीं, टीएमसी सांसद सागरिका घोष और नेता कीर्ती आजाद ने इसे पीएम का "बौद्धिक दिवालियापन" बताया। उनका कहना है कि 'इश्तेहार' बंगाली में घोषणापत्र के लिए इस्तेमाल होने वाला एक बेहद सामान्य और प्रचलित शब्द है।
देखा जाए तो बंगाल की राजनीति अब विकास के दावों से हटकर 'अस्मिता' और 'इतिहास' की गलियों में मुड़ गई है। एक तरफ बीजेपी 'इश्तेहार' शब्द को 1905 के सांप्रदायिक विभाजन से जोड़कर ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी की सेना इसे 'बंगाली भाषा पर हमला' बताकर क्षेत्रीय भावनाओं को भड़का रही है। ऐसे में
2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच ये सवाल है कि, क्या 'इश्तेहार' का यह विवाद बीजेपी को सत्ता के करीब ले जाएगा या टीएमसी अपनी 'बंगाली पहचान' के दांव से बाजी मार ले जाएगी? फिलहाल, बंगाल की हवाओं में 'इश्तेहार' की कड़वाहट और चुनावी गर्मी दोनों बराबर महसूस की जा रही है!


No Previous Comments found.