दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश में PM मोदी का ऐतिहासिक शिव मंदिर दौरा

क्या आपने कभी कल्पना की है कि दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश की धरती 'ओम नमः शिवाय' के महामंत्र से इस कदर गूंज उठेगी कि सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाएं? जी हां, कुछ ऐसा ही अद्भुत, अलौकिक और ऐतिहासिक नजारा देखने को मिला इंडोनेशिया के योग्याकार्ता में! मौका था आज बुधवार, 8 जुलाई 2026 का, जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीन दिवसीय इंडोनेशिया यात्रा के आखिरी दिन एक ऐसे राजसी ठिकाने पर पहुंचे, जिसे देखकर पूरी दुनिया दंग रह गई। हेलीकॉप्टर की खिड़की से जब पीएम मोदी ने नीचे देखा, तो मुंह से तुरंत ही निकल पड़ा....."भव्य प्रम्बानन मंदिर!" जी हां गेरुए रंग के वस्त्रों में लिपटे पीएम मोदी जब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ इस 1100 साल पुराने मंदिर के प्रांगण में कदम रखते हैं, तो नजारा देखने लायक था। सैकड़ों श्रद्धालु जमीन पर आंखें बंद किए, हाथ जोड़े बैठे थे और हवा में तैर रही थी घंटियों की आवाज के साथ 'ओम नमः शिवाय' की पावन ध्वनि। पीएम मोदी खुद पूरी तरह भक्ति में लीन नजर आए। लेकिन आखिर इस मंदिर में ऐसा क्या है जिसने भारत और इंडोनेशिया को अटूट सांस्कृतिक डोर में बांध दिया है? और क्यों पीएम मोदी ने इसे अपनी जिंदगी का एक बड़ा सौभाग्य बताया? आइए, इस स्पेशल रिपोर्ट में प्रम्बानन मंदिर के एक-एक रहस्य और मोदी की इस ऐतिहासिक यात्रा की इनसाइड स्टोरी को जानते हैं!

दरअसल, प्रम्बानन मंदिर सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि सनातन धर्म की उस ताकत का प्रतीक है जो सदियों पहले सात समंदर पार जा पहुंची थी। योग्याकार्ता शहर से करीब 17 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित यह मंदिर इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और दक्षिण-पूर्व एशिया में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शिव मंदिर है। इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां सनातन धर्म के तीनों मुख्य देवों...ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानि त्रिमूर्ति की एक साथ पूजा होती है। मुख्य मंदिर के केंद्र में भगवान शिव की विशाल और भव्य प्रतिमा विराजमान है। इस मंदिर का मूल संस्कृत नाम शिवगृह है, जिसका सीधा सा मतलब होता है...'शिव का घर'। यह मुख्य शिव मंदिर लगभग 47 मीटर ऊंचा है, जो इंडोनेशिया के सबसे ऊंचे प्राचीन धार्मिक स्मारकों में गिना जाता है। वहीं मंदिर के दक्षिण दिशा वाले हिस्से में सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु की अद्भुत मूर्ति स्थापित है। मंदिर के उत्तर दिशा में सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी का स्थान है। वहीं सिर्फ त्रिदेव ही नहीं, बल्कि उनके वाहनों जैसे शिव जी के नंदी के लिए भी परिसर में अलग से विशेष मंदिर बनाए गए हैं। आपको बता दें इस मंदिर का इतिहास 9वीं सदी यानी लगभग 850 ईस्वी पुराना है। इस विशाल मंदिर संकुल की नींव संजया राजवंश के राजा ने रखवाई थी, लेकिन इसका मुख्य निर्माण राजा राकाई पिकातन ने कराया था। जिस समय इस मंदिर को बनाया गया, उस दौर में इंडोनेशिया में बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा प्रभाव था। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभुत्व के बीच हिंदू धर्म और संस्कृति को फिर से मजबूती से स्थापित करने और अपनी शक्ति व एकता को दिखाने के लिए मतारम साम्राज्य के राजा ने इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। इसे माउंट मेरू की तर्ज पर डिजाइन किया गया है। अगर आप इस मंदिर के ऊंचे शिखरों, बड़े प्रांगणों और बनावट को देखेंगे, तो आपको भारत के दक्षिण में स्थित पल्लव और चोल राजवंश के मंदिरों की याद आ जाएगी। यह पूरी तरह से वास्तु शास्त्र की मंडल अवधारणा पर आधारित है। मंदिर की हर दीवार और नक्काशीदार रेलिंग सिर्फ सजावट के लिए नहीं हैं, बल्कि ये सनातन शिक्षा का माध्यम थीं। इन पत्थरों पर भगवान राम के जन्म, उनके वनवास से लेकर रावण वध तक की पूरी रामायण कथा को इतनी खूबसूरती से उकेरा गया है कि कोई भी देखकर पूरी कहानी समझ जाए। इसके अलावा, आज भी यहां रात के समय भव्य रामायण मंचन किया जाता है, जिसे देखने दुनिया भर से लोग आते हैं। आपको बता दें एक समय ऐसा था जब इस भव्य परिसर के अंदर छोटे-बड़े करीब 240 मंदिर हुआ करते थे। अगर पूरे प्रांबानन क्षेत्र की बात करें, तो सेवु, बुब्रह और लुम्बुंग सहित 500 से अधिक मंदिर इस इलाके में फैले हुए हैं।

इतना भव्य होने के बावजूद यह मंदिर सदियों तक इतिहास के पन्नों में खोया रहा और उपेक्षा का शिकार होकर पूरी तरह वीरान पड़ा रहा। लेकिन 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने इसे झाड़ियों और मलबे के बीच से दोबारा खोज निकाला। इसके बाद साल 1991 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित कर दिया। इस मंदिर से जुड़ी एक स्थानीय लोककथा भी बेहद मशहूर है, जिसे राजकुमारी रोरो जोंगग्रांग की कहानी कहा जाता है। मान्यता है कि राजकुमारी को एक श्राप मिला था, जिसके कारण वह पत्थर की मूर्ति बन गई थीं। उन्हें दुर्गा महिषासुरमर्दिनी के रूप में जाना जाता है और उनकी यह मूर्ति आज भी मुख्य शिव मंदिर के भीतर सुरक्षित मौजूद है, जिसे देखने लोग दूर-दूर से आते हैं। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इंडोनेशियाई राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने मिलकर इस दौरे पर प्रम्बानन मंदिर परिसर के संरक्षण और जीर्णोद्धार प्रोजेक्ट का संयुक्त रूप से उद्घाटन किया। दोनों देशों ने इस ऐतिहासिक काम के लिए आशय पत्र भी एक्सचेंज किया है। दरअसल, यह प्रोजेक्ट भारत की एक्ट ईस्ट नीति और महासागर विजन के तहत दोनों देशों के सांस्कृतिक रिश्तों को एक ठोस तकनीकी सहयोग में बदल रहा है। इसकी नींव साल 2025 में ही पड़ गई थी जब राष्ट्रपति प्रबोवो भारत दौरे पर आए थे। दरअसल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, इंडोनेशिया के संस्कृति मंत्रालय और इंडोनेशियन हेरिटेज इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर इस मंदिर को दोबारा उसके पुराने वैभव में लौटाएगा। इसके लिए ASI 'एनास्टाइलोसिस तकनीक' का इस्तेमाल कर रही है। अब आप सोच रहे होंगे कि ये एनास्टाइलोसिस तकनीक क्या है। तो आपको बता दें इस जादुई तकनीक में मंदिर के ढहे हुए हिस्सों को उन्हीं के असली और मूल पत्थरों को ढूंढकर वैज्ञानिक तरीके से दोबारा उसी जगह फिट किया जाता है, यानी कोई नया बाहरी ढांचा नहीं थोपा जाता। वहीं यह जीर्णोद्धार परियोजना साल 2026 और 2027 में शुरू हो रही है, जो कि एक अद्भुत संयोग है। दरअसल, आज से ठीक सौ साल पहले, यानी साल 1927 में भारत के राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर भी जावा और प्रम्बानन मंदिर की यात्रा पर आए थे। टैगोर के आगमन के ठीक 100 साल बाद भारत एक बार फिर इस मंदिर को नया जीवन देने जा रहा है!

देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह प्रम्बानन यात्रा सिर्फ एक सामान्य विदेशी दौरा या दो देशों के राष्ट्रप्रमुखों की मुलाकात भर नहीं थी। यह दुनिया को दिखाने के लिए एक बड़ा संदेश था कि मजहब भले ही अलग हो जाएं, लेकिन संस्कृति, इतिहास और विरासत की जड़ें कभी नहीं बदलतीं। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया ने जिस गर्मजोशी से भारत के प्रधानमंत्री के साथ मिलकर अपने सबसे बड़े हिंदू मंदिर के जीर्णोद्धार का जिम्मा उठाया है, वह वैश्विक स्तर पर आपसी सद्भाव और भाईचारे की एक नई मिसाल है। जब ASI के वैज्ञानिक और इंजीनियर प्रम्बानन के प्राचीन पत्थरों को जोड़कर इतिहास को दोबारा जीवंत करेंगे, तो वह केवल एक मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं होगा, बल्कि वह भारत और इंडोनेशिया के बीच के उस गौरवशाली अतीत का पुनर्जन्म होगा जो सदियों पहले चोल और संजया राजवंशों ने मिलकर लिखा था। अब पूरी दुनिया को इंतजार रहेगा उस दिन का, जब यह मंदिर अपने पूरे निखरे हुए रूप में सामने आएगा और पीएम मोदी अपने वादे के मुताबिक एक बार फिर प्रम्बानन की धरती पर महादेव के आगे शीश झुकाएंगे! 

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