मोदी ने थामा ईरानी राष्ट्रपति का हाथ! तस्वीर में छिपा भारत की विदेश नीति का बड़ा संदेश
इजरायल-अमेरिका से दोस्ती, रूस से तेल और ईरान से रिश्ते....आखिर भारत किसके साथ? जी हां, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच दिल्ली से आई एक तस्वीर ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है...तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान के राष्ट्रपति का हाथ थामे चलते नजर आ रहे हैं। दोनों नेताओं के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति भी दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में अब सवाल ये है कि आखिर इस तस्वीर में ऐसा क्या है, जिसकी इतनी चर्चा हो रही है? क्या ये महज एक कूटनीतिक शिष्टाचार है, या फिर भारत की विदेश नीति का कोई बड़ा संकेत? क्योंकि तस्वीर ऐसे समय सामने आई है, जब पश्चिम एशिया बारूद के ढेर पर बैठा है। ईरान पर अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। तेल की कीमतें सौ डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने की चिंता पैदा कर रही हैं। दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज को लेकर भी नाकाबंदी की आशंका जताई जा रही है। ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री मोदी का ईरानी राष्ट्रपति का हाथ थामकर चलना एक सामान्य तस्वीर जरूर हो सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपे कूटनीतिक संदेश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तो आइए समझते है इस वायरल तस्वीर के पीछे की पूरी कहानी।
दिल्ली के ब्रिक्स सम्मेलन में वो पल आया, जिसने सबकी नजरें खींच लीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का हाथ थामे चलते देखा गया, बिल्कुल ऐसे जैसे किसी फिल्म का सीन हो। उसके साथ मौजूद थे व्लादिमीर पुतिन और सिरिल रामाफोसा। आपको बता दें बात सिर्फ शिष्टाचार की नहीं, बल्कि ये संकेत हैं कि भारत अब अपनी राह खुद चुन रहा है। जी हाँ, यह पहली बार है कि ईरानी राष्ट्रपति भारत आए हैं। 31 अगस्त को बिश्केक में SCO के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात हुई, और फिर दो हफ्ते में दूसरी मुलाकात। ऐसे में साफ है, भारत-तेहरान का रिश्ता अब नई दिशा में बढ़ रहा है। भारत और ईरान के रिश्ते आज के नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और कारोबारी संबंध रहे हैं। आधुनिक दौर में भी दोनों देश ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के मुद्दों पर सहयोग करते रहे हैं। लेकिन आज की दुनिया पहले जैसी नहीं है। ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंध हैं, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव है, इजरायल और ईरान के संबंध बेहद संवेदनशील हैं और पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े टकराव का असर भारत तक पहुंच सकता है। इसलिए भारत के लिए ईरान से बातचीत सिर्फ दोस्ती का मामला नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरत भी है।
दरअसल, भारत की स्थिति बेहद जटिल है। एक तरफ़, इज़राइल के साथ भारत के रक्षा, खुफिया और तकनीकी संबंध गहरे हैं। दूसरी तरफ़, अमेरिका के साथ व्यापार, तकनीक और हिंद-प्रशांत साझेदारी भारत की रणनीतिक प्राथमिकता है। वहीं, ईरान पारंपरिक रूप से भारत का ऊर्जा, चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया से कनेक्टिविटी का साझेदार रहा है। रूस भी भारत को सस्ता तेल और रक्षा उपकरण मुहैया कराता है। इन चारों देशों को एक ही खेमे में रखना लगभग असंभव है, और यही कारण है कि भारत हमेशा संतुलन साधने की कोशिश करता है। यही वजह है कि भारत की नीति को अक्सर रणनीतिक संतुलन की नीति कहा जाता है। भारत का जोर इस बात पर है कि युद्ध और टकराव के बजाय संवाद का रास्ता खुला रहना चाहिए। क्योंकि जब बातचीत बंद होती है, तो गलतफहमियां बढ़ती हैं, तनाव बढ़ता है और उसका असर सिर्फ लड़ने वाले देशों पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ता है।
वहीं अब आते हैं उस मुद्दे पर, जो भारत की अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ा है....होर्मुज। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस परिवहन मार्गों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले ऊर्जा संसाधनों का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल और गैस के आयात पर निर्भर है। ऐसे में अगर पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है या होर्मुज में गंभीर बाधा पैदा होती है, तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों, परिवहन लागत और भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। आपको बता दें ब्रिक्स अब सिर्फ कुछ देशों का आर्थिक मंच नहीं रह गया है। यह दुनिया की बदलती शक्ति-संरचना और वैश्विक दक्षिण की भूमिका पर चर्चा का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
तो कुल मिलाकर, दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति की हाथ थामे तस्वीर सिर्फ कैमरे में कैद हुआ एक पल नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति के बीच भारत की कूटनीतिक सोच की झलक है। भारत एक तरफ इजरायल और अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते मजबूत रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ रूस और ईरान जैसे महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ भी संपर्क बनाए रखना चाहता है। क्योंकि भारत जानता है कि किसी एक देश की नाराजगी के कारण अपने ऊर्जा हितों, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। आने वाले समय में जब दुनिया भारत से किसी एक पक्ष को चुनने की मांग करेगी, तब देखना होगा कि नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों, शांति की अपील और रणनीतिक के बीच कितना मजबूत संतुलन बना पाती है।
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