मोदी-शी जिनपिंग आमने-सामने! BRICS में गलवान के बाद सबसे बड़ी मुलाकात?

राजधानी नई दिल्ली का भारत मंडपम सज्ज हो चुका है और पूरी दुनिया की नजरें भारत की धरती पर टिक गई हैं! 12 और 13 सितंबर 2026 को भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की भव्य मेजबानी करने जा रहा है। लेकिन इस बहुपक्षीय मंच से भी ज्यादा गूंज उस कूटनीतिक भूचाल की है, जो सालों बाद देखने को मिल सकता है। जी हां जून 2020 की खूनी गलवान झड़प के बाद पहली बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब 7 साल बाद भारतीय सरजमीं पर कदम रखने जा रहे हैं। 12 सितंबर को भारत मंडपम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच एक बेहद अहम द्विपक्षीय बैठक हो सकती है। वहीं दूसरी तरफ, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी 11 सितंबर को पीएम मोदी से द्विपक्षीय बातचीत करने पहुंच रहे हैं, जहां सुखोई-57 स्टील्थ फाइटर जेट्स और क्रूड ऑयल की महा-डील्स पर मुहर लग सकती है। तो आइए जानते हैं कूटनीति के इस सबसे बड़े 'पावर गेम' का पूरा सच!

दरअसल, 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद से दोनों देशों के राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। हालांकि, बीते कुछ महीनों में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की चीन यात्रा, बैठकों और सीमा पर गश्त समझौते के बाद अब रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलती दिख रही है। आपको बता दें इस बार ब्रिक्स सम्मेलन इसलिए भी खास है क्योंकि 2026 में इस समूह की स्थापना के 20 साल पूरे हो रहे हैं और भारत चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। इस बार सम्मेलन की थीम है...लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के आधार पर आगे बढ़ना। लेकिन इस सम्मेलन का सबसे ज्यादा इंतजार जिस मुलाकात को लेकर है, वो है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित बैठक। 

जानकारी के मुताबिक, शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आ सकते हैं और 12 सितंबर को ही प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक हो सकती है। अगर यह मुलाकात होती है तो इसका महत्व इसलिए बहुत ज्यादा होगा, क्योंकि गलवान घाटी में 2020 में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के रिश्तों में भारी तल्खी आई थी। गलवान के बाद LAC पर लंबे समय तक सैन्य तनाव बना रहा। दोनों देशों ने सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य साजो-सामान तैनात किया। इसके बाद तनाव कम करने के लिए सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर लगातार कई दौर की बातचीत हुई। धीरे-धीरे कुछ तनाव वाले इलाकों से सैनिकों को पीछे हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी... लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारत-चीन सीमा विवाद पूरी तरह खत्म हो गया है। कई अहम मुद्दे आज भी दोनों देशों के बीच मौजूद हैं। और इन्हीं मुद्दों के बीच अब मोदी-शी की संभावित बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है।

वहीं दोनों नेताओं की हालिया मुलाकात की बात करें तो शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO के मंच पर दोनों नेता एक साथ दिखाई दिए थे। दोनों ने हाथ भी मिलाया था, लेकिन वहां औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत नहीं हुई थी। अब अगर दिल्ली में दोनों आमने-सामने बैठते हैं, तो ये बातचीत भारत-चीन रिश्तों की आगे की दिशा का संकेत दे सकती है। दूसरी तरफ चीन के साथ व्यापार और आर्थिक संबंध भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। संभावित बैठक में व्यापार, निवेश, बाजार तक पहुंच, हाई-टेक उत्पादों का आयात और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे भी उठ सकते हैं। मोदी-शी की बातचीत में अरुणाचल प्रदेश का मुद्दा भी अहम हो सकता है। दरअसल, चीन अरुणाचल प्रदेश को 'जांगनान' यानी दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता रहा है। लेकिन भारत चीन के इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है। भारत का साफ कहना है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। हालांकि आपको बता दें सिर्फ चीन ही नहीं, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत करने से ठीक पहले 11 सितंबर को पीएम मोदी के साथ हाई-लेवल मीटिंग करेंगे। इस बैठक में....

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यानी BRICS का मंच सिर्फ एक बहुपक्षीय सम्मेलन नहीं रहने वाला... बल्कि भारत के लिए चीन और रूस दोनों के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को आगे बढ़ाने का बड़ा मौका बनने जा रहा है। ऐसे में देखा जाए तो नई दिल्ली में सजने जा रहा ब्रिक्स 2026 केवल एक वैश्विक शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि भारत की उस ताकतवर कूटनीति का प्रमाण है, जहां एक ही मंच पर दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियों के राष्ट्रध्यक्ष जुट रहे हैं। गलवान के जख्मों के बाद चीन के साथ रिश्तों को पटरी पर लाना हो या पश्चिमी दबावों के बीच रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना, भारत अपनी शर्तों और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर फैसले ले रहा है। अब 12 सितंबर को भारत मंडपम की उस ऐतिहासिक तस्वीर पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी होंगी, जब पीएम मोदी और शी जिनपिंग एक-दूसरे के आमने-सामने बैठकर एशिया की दो सबसे बड़ी ताकतों का भविष्य तय करेंगे! 

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