पंडित गोपालप्रसाद व्यास हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। वे ब्रजभाषा और पिंगल के मर्मज्ञ माने जाते थे. व्यास को भारत सरकार ने पद्मश्री, दिल्ली सरकार ने शलाका सम्मान और उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से विभूषित किया था. दिल्ली में हिंदी भवन के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. लाल किले पर हर वर्ष होने वाले राष्ट्रीय कवि सम्मेलन की शुरुआत में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है. तो आइए पंडित गोपालप्रसाद व्यास की व्यंग्य कोई कांटा नहीं, कलम कोई नश्तर नहीं पढ़ते हैं..
व्यंग्य कोई कांटा नहीं-
फूल के चुभो दूं ,
कलम कोई नश्तर नहीं-
खून में डूबो दूं
दिल कोई कागज नहीं-
लिखूं और फाडूं
साहित्य कोई घरौंदा नहीं-
खेलूं और बिगाडूं!
मैं कब कहता हूँ-
साहित्य की भी कोई मर्यादा है!
कौन वह कुंठित और जड़ है
जिसने इसे सीमाओं और रेखाओं में बाँधा है?
साहित्य तो कीचड़ का कमल है,
आँधियों में भी लहराने वाली पतंग है।
वह धरती की आह है,
पसीना है, सड़न है, सुगंध है।
साहित्य कुंवारी माँ की आत्महत्या नहीं,
गुनाहों का देवता है,
वह मरियम का पुत्र है,
रासपुटिन का देवता है।
साहित्य फ्रायड की वासनाओं का लेखा नहीं,
गोकुल के कन्हैया की लीला है,
उसके आँगन का हर छोर
विरहिणी गोपियों के आँसुओं से गीला है।
हास्य केले का छिलका नहीं-
सड़क पर फेंक दो और आदमी फिसल जाए,
व्यंग्य बदतमीजों के मुंह का फिकरा नहीं-
कस दो और संवेदना छिल जाए।
हास्य किसी फूहड़ के जूड़े में
रखा हुआ टमाटर नहीं,
वह तो बिहारी की नायिका की
नाक का हीरा है।
मगर वे इसे क्या समझेंगे
जो साहित्य का खोमचा लगाते हैं
और हास्य जिनके लिए जलजीरा है!
इसे समझो, पहचानो,
यह आलोचक नहीं,
हिन्दी का जानीवाकर है
बात लक्षण में नहीं
अभिधा में ही कह रहा हूँ-
अंधकार का अर्थ ही प्रभाकर है!
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