इच्छा कपास का फूल है "रश्मि भारद्वाज"

वे ही क्षण असाधारण हुए 
जो बहुत साधारण बातों से बने थे 

संसार भर का वैभव 
भांति-भांति के वस्त्र पकवान 
भव्य अट्टालिकाएं 
और कितने सन्तप्त मन 
लेकिन रस पाया मैंने उस मोची दम्पति के छप्पर तले 
जो दुनिया भर के फटे जूते सिलने के बाद 
सुकून से दोपहर की रोटी खा रहे थे 

बहुत मामूली चीज़ें मैंने भी जीवन से चाही हैं 
रत्न माणिक 
बहुमूल्य इत्र, परिधान 
काम की चौंसठ कलाएं 
उम्र पार का संग 
सुख यहां नहीं है 
सुख है जब तुम बैठो मेरे सिरहाने 
पढ़ो किसी प्रिय कवि की कोई कविता 
जो उस क्षण के बाद संसार की 
सबसे सुन्दर कविता होगी 

ज्ञानी कहते हैं प्रेम से जटिल कुछ नहीं 
यह भी प्रेम में ही सम्भव है 
आप इतने सहज हो जाएं
इतने भारहीन 
किसी इच्छा से घिरे होकर भी 
उतने ही इच्छामुक्त 
जैसे कपास का फूल 

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