पोलियो की दो बूंदें: बच्चों को जिंदगीभर की दिव्यांगता से बचाने का सुरक्षा कवच
पोलियो एक गंभीर और संक्रामक बीमारी है, जो किसी भी बच्चे की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल सकती है। हंसता-खेलता बच्चा अचानक मांसपेशियों की कमजोरी का शिकार हो सकता है और गंभीर मामलों में उसे स्थायी लकवा भी हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, पोलियो से संक्रमित हर 200 में से लगभग एक व्यक्ति में अपरिवर्तनीय पैरालाइसिस हो सकता है। वहीं, लकवे से प्रभावित लोगों में से 5 से 10 प्रतिशत की मौत सांस लेने वाली मांसपेशियों के प्रभावित होने के कारण हो सकती है।यही वजह है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों को पोलियो से बचाना बेहद जरूरी है। पोलियो की वैक्सीन की दो बूंदें बच्चों को इस खतरनाक बीमारी से बचाने में अहम भूमिका निभाती हैं। भारत में चलाया जाने वाला पल्स पोलियो अभियान इसी उद्देश्य से हर बच्चे तक पहुंचने और उसे संक्रमण से सुरक्षित रखने का प्रयास करता है।
पांच साल से कम उम्र के बच्चों को क्यों दी जाती है प्राथमिकता?
पोलियो वायरस किसी भी उम्र के व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है, लेकिन छोटे बच्चों को विशेष रूप से टीकाकरण के जरिए सुरक्षित रखना जरूरी है। इस उम्र में संक्रमण होने पर गंभीर जटिलताओं का खतरा बना रहता है। इसी कारण पोलियो उन्मूलन अभियानों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों को प्राथमिकता दी जाती है।पल्स पोलियो अभियान के तहत पांच साल तक के सभी बच्चों को ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) की खुराक दी जाती है। यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि कोई भी बच्चा टीकाकरण से छूट न जाए। नियमित टीकाकरण में पहले से पोलियो की खुराक ले चुके बच्चों को भी अभियान के दौरान निर्धारित खुराक दी जाती है।
शरीर में कैसे काम करती हैं पोलियो की दो बूंदें?
पोलियो वायरस मुख्य रूप से संक्रमित मल से दूषित भोजन या पानी के जरिए शरीर में प्रवेश करता है। यह आंतों में अपनी संख्या बढ़ा सकता है और कुछ मामलों में तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर लकवे का कारण बन सकता है।ओरल पोलियो वैक्सीन में कमजोर किए गए जीवित वायरस होते हैं, जो शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद करते हैं। यह विशेष रूप से आंतों में म्यूकोसल इम्युनिटी को मजबूत करती है, जिससे वायरस के संक्रमण और उसके फैलाव को रोकने में मदद मिलती है।वैक्सीन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह बच्चों को पोलियो से सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ समुदाय में वायरस के प्रसार को कम करने में भी मदद करती है। हालांकि, टीकाकरण के बावजूद सुरक्षा के लिए निर्धारित सभी खुराकें लेना जरूरी है।
बार-बार पोलियो ड्रॉप्स पिलाना क्यों जरूरी है?
अक्सर माता-पिता के मन में सवाल उठता है कि जब बच्चे को पहले ही पोलियो की वैक्सीन दी जा चुकी है, तो उसे पल्स पोलियो अभियान के दौरान दोबारा खुराक देने की जरूरत क्यों होती है।दरअसल, हर बच्चे में वैक्सीन के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। बार-बार खुराक देने से अधिक से अधिक बच्चों में पर्याप्त सुरक्षा विकसित करने में मदद मिलती है। सामूहिक टीकाकरण से वायरस के प्रसार को रोकने और पोलियो उन्मूलन के प्रयासों को मजबूत करने में भी सहायता मिलती है।इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे नियमित टीकाकरण के साथ-साथ पल्स पोलियो अभियान के दौरान भी अपने पांच साल से कम उम्र के बच्चे को निर्धारित खुराक जरूर दिलवाएं।
पोलियो की बूंदें और इंजेक्शन, दोनों क्यों हैं जरूरी?
पोलियो से बचाव के लिए ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) और इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सीन (IPV), दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। दोनों वैक्सीन शरीर में अलग-अलग तरीके से प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद करती हैं।
ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV): यह मुंह के जरिए दी जाती है और आंतों में प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद करती है। इससे वायरस के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।
इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सीन (IPV): यह इंजेक्शन के जरिए दी जाती है और शरीर में मजबूत प्रतिरक्षा विकसित करती है, जिससे पोलियो के कारण होने वाले लकवे से सुरक्षा मिलती है।दोनों वैक्सीन पोलियो से बचाव की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बच्चों को उनकी उम्र और राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के अनुसार सभी निर्धारित खुराकें दिलवानी चाहिए।
भारत पोलियो मुक्त है, फिर भी सावधानी क्यों जरूरी है?
भारत ने पोलियो उन्मूलन की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल की है और वर्ष 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को पोलियो मुक्त प्रमाणित किया गया था। हालांकि, दुनिया के कुछ हिस्सों में आज भी पोलियो वायरस मौजूद है। अंतरराष्ट्रीय यात्रा और संक्रमित क्षेत्रों से वायरस के आने की आशंका के कारण सतर्कता बनाए रखना जरूरी है।इसके अलावा, कुछ विशेष परिस्थितियों में ओरल पोलियो वैक्सीन में मौजूद कमजोर वायरस लंबे समय तक फैलते हुए आनुवंशिक बदलाव कर सकता है। बहुत कम मामलों में इससे वैक्सीन-व्युत्पन्न पोलियो वायरस का प्रकोप हो सकता है। यह जोखिम उन समुदायों में अधिक होता है, जहां टीकाकरण का स्तर कम है। इसलिए व्यापक टीकाकरण और निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
बच्चों को पोलियो से बचाना हर माता-पिता की जिम्मेदारी
पोलियो से होने वाला लकवा स्थायी हो सकता है, लेकिन टीकाकरण के जरिए इस बीमारी को रोका जा सकता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के नियमित टीकाकरण का पूरा ध्यान रखें और पल्स पोलियो अभियान के दौरान पांच साल से कम उम्र के बच्चों को निर्धारित खुराक जरूर दिलवाएं।

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