उत्तर प्रदेश सरकार के स्कूल मर्जर के फैसले पर सियासी बवाल...
उत्तर प्रदेश सरकार के बेसिक शिक्षा विभाग ने 16 जून 2025 को एक महत्तवपूर्ण आदेश जारी किया था जिसमें प्राथमिक स्कूलों को उच्च प्राथमिक या कंपोजिट स्कूलों में मर्ज करने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश के बाद यूपी की राजनीति का सियासी पारा चढ़ा हुआ है। तमाम विपक्षी दल इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार पर हमलावर है। पक्ष और विपक्ष की ओर से बयान बाजियों का दौर जारी है। इसी क्रम में अब आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने जोरदार हमला बोला है। आप के यूपी प्रभारी और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने सोमवार को जारी बयान में प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर शिक्षा विरोधी मानसिकता रखने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह बेहद शर्मनाक है कि जिस प्रदेश में लाखों बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, वहां हजारों स्कूल या तो बंद कर दिए गए हैं या जर्जर हालत में चल रहे हैं। दूसरी तरफ शराब की दुकानों की बाढ़ आई हुई है। बच्चों के हाथ से किताब छीनकर बोतल पकड़ाने की कोशिश की जा रही है।
संजय सिंह ने कहा कि आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्तर पर 1.93 लाख शिक्षकों के पद खाली हैं। माध्यमिक में 3,872 और वरिष्ठ माध्यमिक में 8,714 शिक्षक नहीं हैं। मतलब ये कि सरकार खुद मानती है कि करीब 2 लाख शिक्षक नहीं हैं, लेकिन फिर भी उनकी भर्ती की कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई। कई जिलों में ऐसे प्राथमिक विद्यालय चल रहे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक पूरे स्कूल को संभाल रहा है। प्रयागराज जिले में ही 633 स्कूल खतरनाक घोषित किए जा चुके हैं जिनकी इमारतें गिरने की हालत में हैं।
27 हजार से अधिक स्कूल बंद-
आप सांसद ने कहा कि योगी सरकार ने अब तक 27,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद कर दिए हैं। अब 5,000 और स्कूलों को बंद करने की तैयारी में है। यह दलील दी जा रही है कि वहां बच्चों की संख्या कम है। लेकिन, बच्चों की संख्या इसलिए कम है, क्योंकि सरकार ने शिक्षक नहीं दिए। वहां सुविधाएं नहीं दीं और स्कूलों को खुद ही बर्बाद किया। संजय सिंह ने कहा कि ये सब उस सरकार के राज में हो रहा है जो हर दिन ‘डबल इंजन सरकार’ की दुहाई देती है।
आप सांसद ने आरोप लगाया कि जब स्कूल बंद हो रहे थे, तब सरकार ने प्रदेश के खाली खजाने प्रदेश में 27,308 शराब की दुकानें खोल दीं। सरकार को शिक्षा की नहीं, शराब के ठेकों की चिंता है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में प्रति छात्र शिक्षा पर सिर्फ ₹9,167 सालाना खर्च हो रहा है, जो कि राष्ट्रीय औसत ₹12,768 से कहीं कम है।
जनता के सामने असली चेहरा-
आप सांसद संजय सिंह ने कहा कि योगी सरकार का असली चेहरा अब जनता के सामने आ चुका है। यह सरकार नहीं चाहती कि गरीब, दलित, पिछड़ा और किसान का बच्चा पढ़-लिखकर आगे बढ़े। इसीलिए शिक्षा को पूरी तरह से तबाह किया जा रहा है, स्कूलों को या तो मर्ज कर दिया गया है या उन्हें खस्ताहाल छोड़ दिया गया है। आम आदमी पार्टी ने पूरे प्रदेश में ‘स्कूल बचाओ आंदोलन’ शुरू किया है। हम गांव-गांव जाकर जनता को बताएंगे कि योगी सरकार बच्चों से किताबें छीनकर शराब की बोतल थमा रही है।
सांसद ने कहा कि हमे ‘मधुशाला नहीं पाठशाला चाहिए’ के नारे के साथ यह आंदोलन तब तक चलाएंगे, जब तक प्रदेश में हर बच्चे को शिक्षक, स्कूल और शिक्षा का अधिकार नहीं मिल जाता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि योगी सरकार ने तुरंत शिक्षक भर्ती, स्कूलों की मरम्मत और बंद स्कूलों को फिर से शुरू करने की दिशा में कदम नहीं उठाया तो आम आदमी पार्टी यह मुद्दा सड़क से सदन तक जोर-शोर से उठाएगी। हर मोर्चे पर हम सरकार को बेनकाब करेंगे।
क्या है फैसला जानिए विस्तार से-
राज्य सरकार के बेसिक शिक्षा विभाग ने 16 जून 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया था, जिसके तहत प्रदेश के हजारों ऐसे प्राथमिक स्कूल, जहां छात्रों की संख्या बेहद कम है, उन्हें नजदीकी उच्च प्राथमिक या कंपोजिट स्कूलों में मर्ज करने का निर्देश दिया गया था. इस मर्जर से 5000 से अधिक स्कूल प्रभावित हो रहे थे। सरकार का तर्क था कि कम छात्र संख्या वाले स्कूलों में संसाधनों का अपव्यय हो रहा है। इनमें न तो शिक्षक का पूरी तरह उपयोग हो पा रहे हैं और न ही बुनियादी ढांचे का लाभ मिल रहा है। मर्जर के बाद इन संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराई जा सकेगी।
शिक्षक संगठनों और अभिभावकों ने जताई थी आपत्ति-
हालांकि, इस आदेश के खिलाफ कुछ शिक्षक संगठनों और ग्रामीण इलाकों के अभिभावकों ने हाई कोर्ट का रुख किया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि स्कूलों का मर्जर खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा को प्रभावित करेगा। उनका कहना था कि अब बच्चों को दूर स्कूल जाना होगा, जिससे ड्रॉपआउट रेट बढ़ सकता है। साथ ही, उन्होंने यह भी दावा किया कि मर्जर से शिक्षकों की नौकरियों पर भी असर पड़ेगा।
अदालत ने नहीं मानी आपत्तियां-
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि यह सरकार का नीतिगत फैसला है, जिसे व्यापक जनहित में लिया गया है. अदालत ने यह भी कहा कि किसी नीतिगत फैसले में सिर्फ इस आधार पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि कुछ लोगों को उससे असुविधा हो रही है, जब तक कि वह फैसला संविधान के विरुद्ध या दुर्भावनापूर्ण न हो।

No Previous Comments found.