मुद्दों से भिन्न हिंदुस्तान की राजनीती
भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यहाँ चुनावी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि जनमत, विविधता और बहुलता भी राजनीति की आत्मा है। संविधान ने जनता को समान अधिकार और लोकतांत्रिक ढाँचा दिया है। लेकिन आज़ादी के बाद से लेकर वर्तमान समय तक भारतीय राजनीति अक्सर वास्तविक जनमुद्दों – जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, सामाजिक न्याय, स्वच्छ प्रशासन – से भटककर जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और भावनात्मक नारों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यही कारण है कि भारतीय राजनीति पर "मुद्दों से भिन्न" होने का आरोप लगातार लगता है।
स्वतंत्रता आंदोलन से निकली राजनीति में मूल लक्ष्य राष्ट्रनिर्माण, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना और जनता की आकांक्षाओं को पूरा करना था। नेहरू, पटेल, अंबेडकर, मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं ने योजनाओं, संस्थाओं और नीतियों के माध्यम से विकास की नींव रखी। शुरुआती दशकों में शिक्षा का विस्तार, औद्योगिकीकरण और लोकतांत्रिक परंपराओं को स्थापित करने पर बल था।
लेकिन 1960 के दशक के बाद धीरे-धीरे राजनीति में सत्ता की होड़ बढ़ी और राष्ट्रीय दृष्टिकोण की जगह चुनावी गणित और तात्कालिक लाभ ने प्रमुख स्थान ले लिया। यही वह मोड़ था जब भारतीय राजनीति वास्तविक मुद्दों से भटककर पहचान-आधारित राजनीति की ओर मुड़ने लगी।
आधुनिक काल में राजनीति और मीडिया का गहरा संबंध है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, लेकिन आज वह भी कई बार जनमुद्दों से हटकर सनसनीखेज खबरों और राजनीतिक प्रचार का माध्यम बन गया है।
बेरोज़गारी, महंगाई और किसान संकट जैसे मुद्दे पर्याप्त जगह नहीं पाते।
नेताओं के भाषण, विवाद और आरोप-प्रत्यारोप अधिक चर्चित होते हैं।
इससे जनमानस का ध्यान भी मूल समस्याओं से भटक जाता है।
भारत की राजनीति का इतिहास दर्शाता है कि स्वतंत्रता के बाद से आज तक राजनीति कई बार अपने असली रास्ते से भटकती रही है। जहाँ जनता उम्मीद करती है कि उसे रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े उत्तर मिलेंगे, वहीं उसे जाति, धर्म और भावनाओं के नाम पर विभाजित किया जाता है। लोकतंत्र की सशक्तता तभी सुनिश्चित होगी जब राजनीतिक दल और नेता जनमुद्दों को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे।

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