प्रयागराज की त्रिवेणी पर उमड़ा आस्था का महासागर: मकर संक्रांति 2026 का दिव्य दृश्य

प्रयागराज की पावन धरती एक बार फिर भक्ति, विश्वास और अध्यात्म के अद्भुत संगम की साक्षी बनी। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी में आस्था का ऐसा महासागर उमड़ा, जिसे देख हर कोई भाव-विभोर हो उठा।

कड़ाके की ठंड और शीतलहर की परवाह किए बिना, देश के कोने-कोने से आए 1.03 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में पुण्य की डुबकी लगाई। सूर्य के उत्तरायण होते ही मानो श्रद्धा का ज्वार फूट पड़ा। गुरुवार, 15 जनवरी 2026 की सुबह से ही संगम के घाट “हर-हर गंगे” और “जय माँ गंगा” के जयघोष से गूंज उठे।

दो दिन में 1.85 करोड़ श्रद्धालुओं ने किया पुण्य स्नान

मकर संक्रांति का यह स्नान पर्व केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहा। दो दिवसीय आयोजन के दौरान करीब 1.85 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित किया। प्रशासन के अनुसार, मुख्य स्नान दिवस पर ही शाम तक स्नानार्थियों की संख्या एक करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी थी।

अभूतपूर्व सुरक्षा, आधुनिक तकनीक के साथ

इतनी विशाल भीड़ को नियंत्रित करना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन मेला प्रशासन और पुलिस ने इसे बखूबी संभाला।

पूरे मेला क्षेत्र में सीसीटीवी, ड्रोन और AI कैमरों से निगरानी

श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष रूट डायवर्जन और पार्किंग व्यवस्था

हर घाट पर सुरक्षा और सहायता दल तैनात

इन व्यवस्थाओं ने श्रद्धालुओं को सुरक्षित और सहज अनुभव दिया।

दान, भोग और साधु-संतों की दिव्य छटा

स्नान के साथ-साथ श्रद्धालुओं और कल्पवासियों ने तिल-गुड़ का दान किया और संगम तट पर खिचड़ी का भोग अर्पित किया। संतों और नागा साधुओं की उपस्थिति ने पूरे मेले को और अधिक आध्यात्मिक बना दिया। केसरिया वस्त्रों में लिपटे साधु, धूनी रमाए नागा सन्यासी और भक्ति में लीन श्रद्धालु — हर दृश्य अलौकिक प्रतीत हो रहा था।

अब निगाहें मौनी अमावस्या पर

मकर संक्रांति के सफल आयोजन के बाद अब सभी की नजरें 18 जनवरी को होने वाले मौनी अमावस्या स्नान पर्व पर टिकी हैं। अनुमान है कि इस दिन श्रद्धालुओं की संख्या नए कीर्तिमान स्थापित कर सकती है।

प्रयागराज की यह त्रिवेणी केवल नदियों का संगम नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सनातन संस्कृति की जीवंत धरोहर है — जहां हर डुबकी के साथ आत्मा भी पवित्र हो जाती है।

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