एक वचन - जो बना श्री राधारमण लाल जू के मस्तक का अलंकरण

श्री राधारमण लाल जू की परंपरा में गोस्वामी केवल पूजा करने वाले सेवायत नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और आचार्यत्व के जीवंत स्वरूप हैं। यहाँ सेवा घड़ी से नहीं, भाव से मापी जाती है। ऐसे ही एक गोसाईं जी का जीवन इसका साक्ष्य है, जिनके लिए स्वयं से पहले सदैव ठाकुर जी आते हैं।
मंगला सेवा से शयन सेवा तक उनका दिन श्री राधारमण की निष्काम आराधना में बीतता है। इसी सेवा-निष्ठ जीवन में उनके हृदय से एक शांत संकल्प निकला—
श्री राधारमण को मुकुट अर्पित करने का वचन।
यह कोई साधारण इच्छा नहीं थी। ठाकुर जी से किया गया वचन श्रद्धा और उत्तरदायित्व से बंधा होता है। मुकुट भी ऐसा होना था जो उनकी दिव्यता, माधुर्य और मर्यादा के अनुरूप हो।

गोसाईं जी ने न किसी से सहयोग माँगा, न इस संकल्प को प्रचार का विषय बनाया।

अपनी सीमित बचत—जो निजी आवश्यकताओं के लिए थी—उन्होंने उसी मुकुट के लिए सुरक्षित रखी। सम्पूर्ण वर्ष सादगी और संयम के साथ उन्होंने वह राशि एकत्र की, क्योंकि उनके लिए निजी सुख से अधिक महत्वपूर्ण था ठाकुर जी का श्रृंगार।

पौष पूर्णिमा के पावन दिन जब मुकुट श्री राधारमण लाल जू के मस्तक में अर्पित हुआ, वह केवल स्वर्ण या रत्नों से बना आभूषण नहीं था —

वह था तपस्या, त्याग और मौन भक्ति का साकार रूप।

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