लोककला को राष्ट्रीय सम्मान: तमाशा महर्षि रघुवीर खेडकर को पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा
पुणे - महाराष्ट्र की मिट्टी की खुशबू, ढोल-ताशों की थाप और आम जनजीवन के सुख-दुख को मंच पर जीवंत करने वाली लोककला तमाशा को पहली बार देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री पुरस्कार मिला है। वर्ष 2026 में यह गौरव तमाशा महर्षि, उत्कृष्ट सोंगाड्या और महान लोककलावंत श्री रघुवीर खेडकर को प्रदान किया गया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि संपूर्ण तमाशा परंपरा, लोककला और महाराष्ट्र की ग्रामीण संस्कृति की ऐतिहासिक जीत है। 1961 में रत्नागिरी जिले के खेड तालुका में जन्मे रघुवीर खेडकर, दिवंगत तुकाराम खेडकर और दिवंगत कांताबाई सातारकर जैसे कसदार कलाकार दंपति के सुपुत्र हैं। मात्र तीन वर्ष की आयु में पिता का साया उठ जाने के बाद, उनकी मां ही गुरु, आधार और संस्कार बनकर उनके जीवन में रहीं। बचपन से ही कला का बीज उनके रक्त में रच-बस गया। साल 1970 में केवल 9 वर्ष की आयु में बाल कलाकार के रूप में तमाशा फड में रखा गया पहला कदम आज तक थमा नहीं। दशकों से उन्होंने महाराष्ट्र के कोने-कोने में जत्रा, यात्रा और उत्सवों की हजारों रातों को रंगीन बनाया। उन्होंने हास्य के माध्यम से लोगों के दुख कम किए और तमाशा को समाज में सम्मान दिलाया। “नंबर एक का तमाशा फड” के रूप में पहचाना जाने वाला उनका फड आज गुणवत्ता, अनुशासन और कलाकारों के प्रति सम्मान का प्रतीक है। वर्तमान में उनके फड में 110 से अधिक कलाकार ससम्मान कार्यरत हैं, जिनके परिवारों का जीवन इस कला पर निर्भर है। यह अपने आप में एक बड़ी सामाजिक सेवा है।
तमाशा कलाकारों के मानधन और प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने हमेशा संघर्ष किया। उच्चवर्गीय मानसिकता से उपेक्षा, अपमान और अनेक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने परंपरा की रीढ़ टूटने नहीं दी। विरासत को न केवल जिया, बल्कि अगली पीढ़ी को गर्व के साथ सौंपा। तमाशा की पंढरी कहे जाने वाले नारायणगांव के लाडले दामाद रघुवीर खेडकर, शिवजन्मभूमि वासियों के लिए गर्व का विषय हैं। सात पीढ़ियों से उनका परिवार इस क्षेत्र में सक्रिय है। उन्हें कई फिल्मी प्रस्ताव मिले और “जूनियर लक्ष्मीकांत बेर्डे” के नाम से पहचान भी मिली, लेकिन उन्होंने लोककला का हाथ कभी नहीं छोड़ा। सोंगाड्या उनकी खास पहचान है, वहीं समई नृत्य की उनकी अद्भुत प्रस्तुति आज भी दर्शकों को रोमांचित कर देती है। 65 वर्ष की आयु में भी, दो बार बायपास सर्जरी के बावजूद, वही जोश और वही जुनून उनके भीतर जीवंत है। इस संपूर्ण यात्रा में उनकी बहनें अनिता, अल्का और विशेष रूप से मंदाराणी का अमूल्य योगदान रहा। मंदाराणी ने मात्र 7 वर्ष की आयु से इस क्षेत्र में कदम रखा। “सर्जा” फिल्म में मुख्य नायिका का अवसर मिलने के बावजूद, परिवार द्वारा खड़े किए गए कला साम्राज्य को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने वह प्रस्ताव ठुकरा दिया।
कोरोना काल इस परिवार के लिए अग्निपरीक्षा साबित हुआ। आठ लोग संक्रमित हुए, मां सहित दो सदस्यों का निधन हुआ, लेकिन असंख्य पीड़ाओं के बावजूद कला से नाता नहीं टूटा। उनके पुत्र अमर, बचपन से दिव्यांग हैं। बैसाखियों के सहारे चलने वाले अमर आज भी नारायणगांव में रिक्शा चलाकर स्वाभिमान से जीवन यापन कर रहे हैं। यह स्वाभिमान की जीवंत मिसाल है। पद्मश्री पुरस्कार केवल सम्मान नहीं, बल्कि मिट्टी की कला को मिली राजमान्यता है। तमाशा लोककला को मिला यह पहला पद्मश्री, इतिहास रचने वाला क्षण है। पुरस्कार की घोषणा के बाद रघुवीर खेडकर के शब्द थे— “बचपन से जो मेहनत की, उसका फल मिला…” ये शब्द नहीं, बल्कि एक कलाकार की तपस्या हैं। रघुवीर खेडकर की यह यात्रा प्रेरणादायक, गौरवशाली और अविस्मरणीय है। उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। तमाशा लोककला ऐसे ही स्वर्णिम दिनों की ओर अग्रसर हो—यही कामना।
संवाददाता - संजय सुभाष चव्हाण शिरूर

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