भीमा के पानी में शहरों का जहर; दौंड की खेती और सेहत की कीमत कौन चुकाएगा?

दौंड :  पुणे और पिंपरी-चिंचवड के तेजी से बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण का पर्यावरणीय बोझ आखिर कब तक दौंड तहसील उठाएगी? शहरों से निकलने वाला सीवेज और विभिन्न स्रोतों से आने वाले प्रदूषक मुला-मुठा नदी के रास्ते भीमा के प्रवाह में पहुंचते हैं। आगे यही भीमा दौंड तहसील के विशाल कृषि क्षेत्र की जीवनरेखा बनती है और अंततः उजनी जलाशय में पहुंचती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि शहरों के विकास की पर्यावरणीय कीमत नदी के निचले प्रवाह में बसे किसानों और नागरिकों को क्यों चुकानी पड़े?

यह मामला अब केवल स्थानीय शिकायतों तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB) के मार्च 2025 तक अद्यतन वर्गीकरण में भीमा और मुला-मुठा दोनों नदियां Priority-II प्रदूषित नदी खंडों में शामिल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की उपलब्ध 2022-23 की निगरानी जानकारी में मुला-मुठा के मुंढवा पुल से थेऊर के डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में अधिकतम BOD 21 mg/L दर्ज किया गया था।
पारगांव के बाद दौंड की ओर बढ़ता प्रदूषण का प्रवाह
दौंड तहसील का पारगांव क्षेत्र इस पूरी प्रदूषण श्रृंखला का महत्वपूर्ण पड़ाव है। मुला-मुठा का पानी भीमा के प्रवाह में मिलने के बाद आगे दौंड की ओर बढ़ता है। इसलिए पारगांव से दौंड और आगे उजनी की दिशा में जाने वाला नदी क्षेत्र खेती, भूजल और पेयजल की दृष्टि से विशेष अध्ययन की मांग करता है।
राहू, पिंपलगांव, देलवडी, पारगांव, नानगांव, हातवळण, वालकी, कानगांव, सोनवडी, कोरेगांव भिवर, पानवली, वडगांव बांडे, टाकली भीमा, दौंड शहर तथा आगे शिरापुर, खोरवडी और देऊलगांव राजे सहित कई गांव भीमा नदी के किनारे अथवा उसके प्रभाव क्षेत्र से जुड़े हैं।
इन गांवों की कितनी आबादी पेयजल, खेती, कुओं या अन्य जरूरतों के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भीमा पर निर्भर है, इसकी समेकित आधिकारिक जानकारी सामने आना आवश्यक है।
दौंड में भी पानी की गुणवत्ता ‘Bad’
प्रदूषण का असर केवल पुणे तक सीमित नहीं रहने की गंभीर तस्वीर MPCB के जून 2025 के जल गुणवत्ता बुलेटिन से सामने आती है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार दौंड के महादेव मंदिर के पास भीमा नदी के पानी की गुणवत्ता ‘Bad’ श्रेणी में दर्ज की गई थी।
दौंड तहसील में पारगांव के पास मुला-मुठा संगम के बाद तथा दौंड के महादेव मंदिर क्षेत्र में MPCB के जल गुणवत्ता निगरानी केंद्र हैं। यानी ऊपरी क्षेत्र से आने वाले पानी की गुणवत्ता की निगरानी आधिकारिक स्तर पर दौंड तक की जा रही है।
ऐसे में सवाल सीधा है—
नदी बह रही है या शहरों के सीवेज का बोझ ढो रही है?
सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं?
CPCB की उपलब्ध 2022-23 की जानकारी के अनुसार कुछ निगरानी स्थलों पर अधिकतम BOD इस प्रकार दर्ज किया गया था—
बंडगार्डन के बाद — 23 mg/L
पारगांव, दौंड — 11.5 mg/L
दौंड, महादेव मंदिर क्षेत्र — 9.5 mg/L
उजनी बैकवॉटर, कुंभारगांव — 10 mg/L
नरसिंहपुर — 13 mg/L
BOD यानी Biochemical Oxygen Demand (जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग)। पानी में मौजूद जैव-विघटनीय कार्बनिक पदार्थों को विघटित करने के लिए सूक्ष्मजीवों को कितनी ऑक्सीजन चाहिए, इसका यह एक संकेतक है। बढ़ा हुआ BOD पानी में अधिक जैविक प्रदूषण भार का संकेत हो सकता है।
हालांकि BOD ही एकमात्र पैमाना नहीं है। पानी की वास्तविक स्थिति जानने के लिए COD, DO, pH, जीवाणु प्रदूषण, पोषक तत्व और आवश्यकता के अनुसार भारी धातुओं की जांच भी महत्वपूर्ण है।
Action Plan है, फिर प्रदूषण क्यों कायम?
MPCB के पास भीमा नदी के Priority-II प्रदूषित हिस्से के लिए Pollution Control Action Plan है। इसमें शहरों के सीवेज को उपचार के बिना नदी में जाने से रोकना, पर्याप्त STP क्षमता विकसित करना, औद्योगिक अपशिष्ट पर नियंत्रण, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कार्रवाई, नालों के सीवेज को उपचार संयंत्रों की ओर मोड़ना और नदी के पानी की नियमित जांच जैसे उपाय शामिल हैं।
स्थानीय निकायों से अपेक्षा है कि वे अपने क्षेत्र में उत्पन्न सीवेज का उचित उपचार और निस्तारण करें। River Rejuvenation Committee, MPCB तथा संबंधित विभागों को भी Action Plan की प्रगति की समीक्षा करनी होती है।
लेकिन सवाल है कि Action Plan होने के बावजूद भीमा आज भी Priority-II प्रदूषित नदी खंड में क्यों है? कितने काम पूरे हुए, कितने अधूरे हैं और दौंड पहुंचने से पहले ही नदी में मिलने वाले प्रदूषण की जिम्मेदारी कौन लेगा?
दौंड का STP : कागज पर क्षमता, जमीन पर क्या स्थिति?
दौंड शहर का सीवेज सीधे नदी में जाने से रोकने के लिए नगरपालिका की भूमिगत सीवरेज योजना और STP यानी Sewage Treatment Plant प्रमुख व्यवस्था है।
महाराष्ट्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष दाखिल हलफनामे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार दौंड शहर से करीब 4.5 MLD सीवेज उत्पन्न होता है और नगरपालिका के पास 10.5 MLD क्षमता के STP उपलब्ध होने का उल्लेख किया गया है।
एक MLD यानी प्रतिदिन दस लाख लीटर।
लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों में विसंगति दिखाई देती है। 2024 की एक राज्यस्तरीय प्रगति रिपोर्ट की उपलब्ध प्रति में दौंड के 4.2 MLD STP को ‘Non-operational’ दिखाया गया था और अतिरिक्त 6 MLD क्षमता का प्रस्ताव दर्ज था। बाद के NGT हलफनामे में कुल 10.5 MLD क्षमता उपलब्ध होने की बात कही गई।
वहीं नगरपालिका अधिकारियों से की गई पूछताछ में STP पिछले करीब एक वर्ष से बंद होने की जानकारी मिली है।
ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है—यदि STP बंद है तो दौंड शहर से प्रतिदिन निकलने वाले लाखों लीटर सीवेज का क्या हो रहा है? उसका उपचार कहां हो रहा है? कितना सीवेज नालों से आगे जा रहा है और STP दोबारा कब शुरू होगा?
दौंड की जनता को इसका स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए।
खेती की जड़ों तक पहुंच रहा पानी का सवाल
दौंड तहसील की कृषि अर्थव्यवस्था भीमा नदी से गहराई से जुड़ी है। गन्ना, गेहूं, ज्वार, सब्जियां, फल-बागान और पशुपालन के लिए नदी तथा नदी से जुड़े जलस्रोतों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।
तहसील में 102 राजस्व गांव और 81 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें नदी किनारे का बड़ा क्षेत्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भीमा के पानी से जुड़ा है।
यदि प्रदूषित अथवा अधिक लवणयुक्त पानी का लगातार सिंचाई में उपयोग होता है तो मिट्टी की गुणवत्ता पर दीर्घकालीन असर पड़ सकता है। लवणता बढ़ने, मिट्टी के भौतिक-रासायनिक गुण बदलने और कृषि उत्पादकता प्रभावित होने की आशंका को वैज्ञानिक जांच से परखा जाना चाहिए।
लेकिन दौंड में भीमा के प्रदूषण से वास्तव में कितने हेक्टेयर कृषि क्षेत्र पर असर पड़ा? कितनी जमीन लवणीय हुई? किस फसल के उत्पादन पर कितना असर पड़ा? इसकी स्वतंत्र और अद्यतन तहसील स्तरीय जानकारी उपलब्ध होना जरूरी है।
अब चाहिए ‘Soil & Water Health Map’
कृषि विभाग को नदी किनारे के गांवों में मिट्टी और सिंचाई के पानी के नमूने लेकर EC, pH, लवणता, जैविक घटकों और आवश्यकता के अनुसार संभावित भारी धातुओं की जांच करनी चाहिए।
हर गांव का अलग ‘Soil & Water Health Map’ बनाया जाए तो भीमा के पानी का खेती पर वास्तविक असर पहली बार वैज्ञानिक तरीके से सामने आ सकता है।
भीमा पर जलकुंभी का ‘हरा संकट’
भीमा के कुछ हिस्सों में फैली जलकुंभी किसानों के लिए नई सिरदर्द बन गई है। नदी से पानी उठाने वाले पाइप और फुटवॉल्व के आसपास जलकुंभी फंसने के कारण किसानों को बार-बार उसे हटाना पड़ता है। इससे समय, मजदूरी और खर्च बढ़ता है तथा कुछ स्थानों पर पंप की कार्यक्षमता प्रभावित होने की शिकायतें भी हैं।
जलकुंभी की अत्यधिक वृद्धि पानी में पोषक तत्वों की अधिकता से जुड़ी हो सकती है। सीवेज के जरिए नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व अधिक मात्रा में पहुंचें तो ऐसी वनस्पतियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।
जलकुंभी हटती है, मगर फिर लौट आती है!
सिर्फ जलकुंभी निकालना अस्थायी उपाय हो सकता है। यदि उसकी वृद्धि के मूल कारण यानी प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण नहीं हुआ तो कुछ समय बाद समस्या फिर सामने आ सकती है।
इसलिए नीति ‘जलकुंभी हटाओ’ से आगे बढ़कर ‘जलकुंभी बढ़ने का कारण हटाओ’ की होनी चाहिए।
पानी प्रदूषित, तो सेहत का क्या?
दूषित नदी जल को सीधे पीने, अपर्याप्त रूप से उपचारित पानी अथवा दूषित जलस्रोतों के उपयोग से जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए नदी किनारे प्रत्येक गांव के पेयजल नमूनों की नियमित जांच और परिणामों को नागरिकों के लिए सार्वजनिक करना आवश्यक है।
स्वास्थ्य की सावधानी
“दूषित पानी तथा बारिश के दौरान पानी में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों से कॉलरा, टाइफाइड, गैस्ट्रो, दस्त और पेचिश जैसी जलजनित बीमारियां हो सकती हैं। नागरिक उबला या फिल्टर किया पानी पिएं। खुले और अस्वच्छ खाद्य पदार्थों से बचें तथा भोजन और पानी लेने से पहले हाथ अच्छी तरह धोएं।”
— डॉ. दिनेश खानसोळे, चिकित्सा अधिकारी, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, देऊलगांव राजे
हालांकि नदी प्रदूषण के कारण दौंड में कितने नागरिक बीमार पड़े, इसका सीधा निष्कर्ष पर्याप्त आंकड़ों के बिना नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए नदी किनारे के गांवों में पिछले पांच वर्षों के जलजनित रोगों के आंकड़ों की उसी अवधि के पानी के नमूनों से तुलना जरूरी है।
वर्षों से सवाल वही!
Action Plan है। STP है। MPCB के निगरानी केंद्र हैं। नदी पुनर्जीवन की व्यवस्था है। पानी के नमूनों की जांच भी होती है।
फिर भी यदि दौंड में पानी की गुणवत्ता ‘Bad’ दर्ज हो रही है, तो सवाल योजनाओं की संख्या का नहीं बल्कि उनकी जमीनी प्रभावशीलता का है।
‘योजनाएं कागज पर और प्रदूषण भीमा के पानी में’ जैसी स्थिति रोकने के लिए प्रत्येक संबंधित विभाग की जिम्मेदारी और कार्य पूरा करने की समयसीमा सार्वजनिक होनी चाहिए।
पांच सवाल; प्रशासन जवाब दे!
दौंड तहसील में भीमा के पानी पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर गांवों की वास्तविक संख्या कितनी है?
पिछले पांच वर्षों में इन गांवों के पेयजल के कितने नमूने जांचे गए और उनमें कितने पीने योग्य नहीं पाए गए?
नदी किनारे कितने हेक्टेयर कृषि क्षेत्र की मिट्टी और पानी की जांच हुई? लवणीय अथवा प्रदूषण प्रभावित क्षेत्र कितना है?
पुणे-पिंपरी क्षेत्र से भीमा तक पहुंचने वाले सीवेज के 100 प्रतिशत उपचार का लक्ष्य कब पूरा होगा?
MPCB के जून 2025 बुलेटिन में दौंड क्षेत्र का पानी ‘Bad’ दर्ज होने के बाद कौन-सी ठोस सुधारात्मक कार्रवाई की गई?
नागरिकों का सवाल : हमारे हिस्से में स्वच्छ भीमा कब?
नदी किनारे प्रत्येक गांव के पेयजल स्रोतों की नियमित जांच होनी चाहिए और रिपोर्ट ग्राम पंचायत कार्यालय में नागरिकों के लिए उपलब्ध कराई जानी चाहिए। नमूना पीने योग्य नहीं मिलने पर गांव को तत्काल वैकल्पिक सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए।
नदी किनारे की कृषि भूमि, कुओं और सिंचाई जल की विशेष जांच मुहिम चलाई जाए। यदि वैज्ञानिक जांच में प्रदूषण से नुकसान प्रमाणित होता है तो मुआवजे की व्यवस्था हो और ‘Polluter Pays’ सिद्धांत के तहत प्रदूषण फैलाने वालों की जिम्मेदारी तय की जाए।
अब जरूरत ‘दौंड वाटर ऑडिट’ की
तहसील प्रशासन, पंचायत समिति, कृषि विभाग, स्वास्थ्य विभाग, जल संसाधन विभाग, दौंड नगरपालिका और MPCB को मिलकर ‘भीमा नदी प्रदूषण — दौंड तहसील स्थिति रिपोर्ट’ तैयार करनी चाहिए।
पारगांव में मुला-मुठा संगम के बाद, दौंड शहर, नदी के प्रमुख बांधों और उजनी की ओर जाने वाले प्रवाह के महत्वपूर्ण स्थानों से नियमित नमूने लिए जाएं। इसके साथ नदी किनारे के गांवों के कुओं, सार्वजनिक पेयजल योजनाओं और खेतों की मिट्टी-पानी की भी जांच हो।
पानी की गुणवत्ता + मिट्टी परीक्षण + पेयजल नमूने + जलजनित बीमारियां + सिंचाई क्षेत्र—इन सभी की गांववार जानकारी एक रिपोर्ट में आए तो दौंड पर भीमा प्रदूषण के वास्तविक प्रभाव की वस्तुनिष्ठ तस्वीर सामने आ सकेगी।
आखिरी सवाल...
पुणे का विकास होना चाहिए। उद्योगों का विस्तार भी जरूरी है। लेकिन उस विकास से पैदा होने वाले सीवेज और प्रदूषण की कीमत दौंड के किसानों की जमीन और नदी किनारे रहने वाले नागरिकों की सेहत क्यों चुकाए?
भीमा दौंड के लिए केवल एक नदी नहीं है। वह खेती, पेयजल, पशुधन, मत्स्य व्यवसाय और हजारों परिवारों की आजीविका से जुड़ी जीवनरेखा है।
इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं है—
‘भीमा में कितना पानी है?’
असल सवाल है—
‘भीमा के पानी की गुणवत्ता कैसी है और स्वच्छ भीमा देने की जिम्मेदारी किसकी है?’
वरना भीमा बहती रहेगी, लेकिन उसके किनारे की समृद्धि धीरे-धीरे सूखती जाएगी।

रिपोर्टर : प्रमोद दत्तात्रय काकडे 

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