किसानों के लिए मूली की खेती की टिप्स
मूली (Radish) एक लोकप्रिय जड़ वाली सब्ज़ी है, जिसे पूरे भारत में सभी मौसमों में उगाया जा सकता है। यह ताजी सलाद, अचार और सूप बनाने में उपयोग होती है। मूली में विटामिन C, कैल्शियम, फाइबर और अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो इसे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी बनाते हैं।
भूमि और जलवायु
मूली लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है, लेकिन हल्की दोमट (loamy) और उपजाऊ मिट्टी सर्वोत्तम रहती है।
मिट्टी का pH 6.0 से 7.0 के बीच होना चाहिए।
ठंडी और सुखद जलवायु मूली की खेती के लिए अनुकूल होती है। 15–25°C तापमान सबसे अच्छा माना जाता है।
बीज और बुवाई
मूली के बीज छोटे और कठोर होते हैं।
बीज बोने से पहले मिट्टी को भुरभुरा और उपजाऊ बनाया जाता है।
रोपाई या बुवाई के लिए पंक्तियों की दूरी लगभग 20–30 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
बीज को लगभग 1–2 सेंटीमीटर गहराई में बोया जाता है।
सिंचाई और देखभाल
मूली को नियमित और पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है।
बीज अंकुरित होने तक मिट्टी को नम रखना चाहिए।
खेत में खरपतवारों की रोकथाम नियमित रूप से करनी चाहिए।
पंक्तियों के बीच मिट्टी को हल्का सा खोदना और ढकना पौधों की बढ़वार में मदद करता है।
उर्वरक और पोषण
मूली के लिए नाइट्रोजन और फास्फोरस युक्त उर्वरक महत्वपूर्ण हैं।
अच्छी उपज के लिए खेत में पहले खाद (जैसे गोबर की खाद) मिलाना लाभकारी रहता है।
सामान्यतः NPK अनुपात 20:20:20 का संतुलित उर्वरक प्रयोग किया जाता है।
रोग और कीट
रोग: म्यूकोर रूट, पत्तियों का पीला पड़ना, फफूंदी इत्यादि।
कीट: पत्तेदार कीड़े, रतुआ, पत्तों पर कीड़े।
जैविक कीट नियंत्रण, नीम का तेल या उचित कीटनाशक का प्रयोग लाभकारी होता है।
कटाई और उपज
मूली बोने के 30–60 दिनों के भीतर कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
उपज का अनुमान मिट्टी, जलवायु और देखभाल पर निर्भर करता है।
अच्छी देखभाल से प्रति हेक्टेयर 20–30 टन मूली प्राप्त की जा सकती है।
मूली की खेती छोटे और बड़े किसानों के लिए लाभकारी व्यवसाय साबित हो सकती है। उचित बीज, सही जलवायु, पर्याप्त सिंचाई और पोषण पर ध्यान देने से उच्च गुणवत्ता और अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।
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