ऊंचाहार में मनरेगा घोटाला: फर्जी फोटो से 61 मजदूरों को दिखाकर सरकारी धन की लूट
रायबरेली : ऊंचाहार के सराय हरदो ग्राम सभा में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) के तहत एक बड़ा घोटाला सामने आया है। सरकारी कागजों में 7 अलग-अलग मस्टर रोल में 61 मजदूरों को कार्यरत दिखाया गया, लेकिन जब इस मामले की मीडिया ने तरीके से जांच की, तो चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई।
एक ही व्यक्ति की जियो टैग की गई तस्वीर को बार-बार इस्तेमाल कर अलग-अलग मजदूरों के रूप में दर्शाया गया। यानी कि फर्जी फोटो लगाकर मजदूरों की संख्या बढ़ा दी गई और मनरेगा फंड से लाखों रुपये का फर्जी भुगतान निकाला गया। इससे स्पष्ट होता है कि इस घोटाले में ग्राम प्रधान, पंचायत सचिव और मनरेगा से जुड़े अधिकारी पूरी तरह से लिप्त हैं।
कैसे हुआ फर्जीवाड़ा?
सूत्रों के मुताबिक, जांच में ऐसे तीन-चार मजदूरों की पहचान हुई जिनकी एक ही फोटो को सातों मस्टर रोल में अलग-अलग नामों से इस्तेमाल किया गया। इसका मतलब यह है कि असली मजदूरों को काम तक नहीं दिया गया, लेकिन फर्जी हाजिरी दिखाकर पैसे निकाल लिए जाएंगे। आपको बता दें कि यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि मनरेगा फंड की लूट एक संगठित गिरोह की तरह चल रही है। मजदूरों के नाम पर कागजों में ही विकास कार्य दिखाकर सरकारी पैसा हड़पा जा रहा है। कई मामलों में तो जो मजदूर सूची में दर्ज हैं, वे कभी साइट पर गए ही नहीं, लेकिन उनकी हाजिरी भर दी गई।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
वही ग्राम सभाओं में हो रहे भ्रष्टाचार की शिकायत एपीओ आकांक्षा त्रिपाठी से की गई, तो उन्होंने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसके बाद से ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव मनमानी करने पर उतारू हो चुके हैं।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रशासन खुद इस भ्रष्टाचार में शामिल है, या फिर प्रभावशाली लोगों के दबाव में चुप बैठा है? अगर अधिकारी निर्दोष हैं, तो अब तक दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिर क्यों गरीब मजदूरों के हक का पैसा हड़पने वालों पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया?
मनरेगा योजना को लूट में बदलते अधिकारी
मनरेगा योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करना और गरीबों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना था। लेकिन ऊंचाहार में यह योजना भ्रष्टाचारियों की कमाई का जरिया बन चुकी है। अगर इस मामले की तत्काल निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह भ्रष्टाचार और बढ़ता जाएगा और गरीबों को उनका हक नहीं मिल पाएगा।
अब क्या होना चाहिए?
इस घोटाले की जांच एसडीएम या किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए, ताकि दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो। इसके अलावा, ग्राम प्रधान, पंचायत सचिव और एपीओ समेत अन्य संबंधित अधिकारियों के खातों की जांच की जाए ताकि यह पता चल सके कि आखिर किन लोगों ने सरकारी धन का गबन किया है।
अगर प्रशासन ने इस पर जल्द कार्रवाई नहीं की, तो यह साफ हो जाएगा कि वह खुद इस भ्रष्टाचार में लिप्त है। वही सूत्रों का कहना है।मनरेगा घोटाले में शामिल सभी दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए और सरकारी धन को लूटने वालों को सजा मिले। वरना यह योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रहेगी और गरीब मजदूरों के हक पर डाका डालने का सिलसिला जारी रहेगा।
रिपोर्टर : आशीष मौर्य

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