AAP के 7 बागी सांसदों की बीजेपी में एंट्री को मिली सभापति से मंजूरी
भारतीय राजनीति के इतिहास में शुक्रवार का दिन किसी पॉलिटिकल थ्रिलर से कम नहीं रहा। जिस आम आदमी पार्टी को अरविंद केजरीवाल ने अपने पसीने से सींचा, जिस संगठन को उन्होंने लोहे की दीवार समझा था, उसे उनके ही सबसे भरोसेमंद सिपाही ने ढहा दिया। जी हां राघव चड्ढा, जिन्हें केजरीवाल का हनुमान कहा जाता था, आज वही अपनी ही लंका में आग लगाकर बीजेपी के पाले में जा खड़े हुए हैं। राज्यसभा में ऐसा भूचाल आया कि आप का कुनबा बिखर गया। यह सिर्फ दलबदल नहीं, यह केजरीवाल के भरोसे का कत्ल है! क्या ये आम आदमी पार्टी के अंत की शुरुआत है या फिर बीजेपी की पंजाब विजय का मास्टरस्ट्रोक? देखिए हमारी इस खास रिपोर्ट में!
राज्यसभा में शुक्रवार को वो हुआ जिसकी कल्पना शायद अरविंद केजरीवाल ने सपने में भी नहीं की होगी। राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों ने एक साथ बगावत का बिगुल फूंक दिया। इन सातों सांसदों ने केवल पार्टी ही नहीं छोड़ी, बल्कि दो-तिहाई बहुमत का दावा करते हुए अपनी यूनिट का बीजेपी में विलय कर दिया। कल तक राज्यसभा में 10 सांसदों के साथ दहाड़ने वाली आप अब महज 3 सांसदों संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता और संत बलबीर सिंह पर सिमट कर रह गई है। वहीं आज राज्यसभा चेयरमैन ने भी इस विलय को मंजूरी दे दी है और बीजेपी सांसदों की सूची में इन 7 नए नामों के जुड़ते ही बीजेपी की संख्या 113 पहुंच गई है। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने मिठाई खिलाकर इन बागियों का स्वागत किया, जो केजरीवाल के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा था। वहीं इन सातों सांसदों की प्रोफाइल पर नजर डालें तो इसमें पॉलिटिकल पावर और मनी पावर का अद्भुत संगम है।
राघव चड्ढा: पार्टी के रणनीतिकार और सबसे युवा चेहरा।
संदीप पाठक: संगठन के चाणक्य और चुनाव मैनेजमेंट के मास्टरमाइंड।
स्वाति मालीवाल: दिल्ली का जाना-माना चेहरा और प्रखर वक्ता।
हरभजन सिंह: टीम इंडिया के दिग्गज क्रिकेटर, जिनका पंजाब में अपना क्रेज है।
अशोक मित्तल: शिक्षा और मिठाई के बड़े कारोबारी।
विक्रमजीत सिंह साहनी: भारत से अफ्रीका तक फैला बड़ा बिजनेस साम्राज्य।
राजेंद्र गुप्ता: टेक्सटाइल, पेपर और फर्टिलाइजर के बड़े उद्योगपति।
ऐसे में सवाल उठता है कि इस टूट का पंजाब विधानसभा चुनाव पर क्या असर होगा? तो आपको बता दें राघव चड्ढा, संदीप पाठक और स्वाति मालीवाल संगठन के नेता तो हैं, लेकिन जन नेता नहीं हैं। इनमें से किसी ने भी अब तक सीधे जनता के बीच जाकर कोई बड़ी चुनावी जीत हासिल नहीं की है। पंजाब की धरती पर अभी भी अरविंद केजरीवाल, सीएम भगवंत मान और मनीष सिसोदिया का सिक्का चलता है। लेकिन, असली चोट पंजाब के वोट बैंक पर नहीं, बल्कि पार्टी की रीढ़ पर लगी है। राघव चड्ढा के पास पार्टी की हर अंदरूनी जानकारी, फंडिंग के स्रोत और भविष्य की रणनीतियां थीं। उनका जाना आप की इमेज और वित्तीय ढांचे को हिलाकर रख देगा। दरअसल, राघव चड्ढा का आप में सफर 2012 में अन्ना आंदोलन के समय से शुरू हुआ था। केजरीवाल ने उन पर इतना भरोसा किया कि उन्हें जनलोकपाल बिल का ड्राफ्ट तैयार करने से लेकर दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष और पंजाब के सह-प्रभारी तक की जिम्मेदारी सौंपी। पंजाब में 117 में से 92 सीटें जिताने वाले चड्ढा को सुपर सीएम तक कहा जाने लगा था। लेकिन 24 अप्रैल 2026 को यह सफर एक कड़वाहट के साथ खत्म हुआ। राघव ने आरोप लगाया कि पार्टी रास्ते से भटक गई है, जबकि पार्टी ने इसे सत्ता का लालच बताया।
वहीं दूसरी तरफ पार्टी के भीतर इस बगावत ने आग लगा दी है। राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इसे गैर-कानूनी बताते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना गुस्सा निकाला। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा कि बीजेपी नियमों की धज्जियां उड़ा रही है और इन सातों की सदस्यता रद्द होनी चाहिए।
वहीं, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान का गुस्सा सातवें आसमान पर दिखा। उन्होंने राघव चड्ढा को सीधा गद्दार करार दिया। मान ने कहा कि जिस पार्टी ने उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचाया, जिसे सुपर सीएम का सम्मान दिया, उसी ने पीठ में छुरा घोंपा है।
देखा जाए तो पंजाब की राजनीति में अब आर-पार की जंग छिड़ गई है। राघव चड्ढा का यह कदम केजरीवाल की राजनीति का क्लाइमेक्स है। 7 सांसदों का टूटना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक भरोसा है जो टूट चुका है। राज्यसभा में अब आम आदमी पार्टी की आवाज कमजोर होगी, लेकिन पंजाब की सड़कों पर असली मुकाबला अगले साल विधानसभा चुनाव में दिखेगा। क्या भगवंत मान और केजरीवाल इस बिखरे हुए कुनबे को फिर से समेट पाएंगे, या बीजेपी इन बागियों के दम पर पंजाब फतह करेगी? यह तो वक्त बताएगा, लेकिन आज राघव चड्ढा ने आप के इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय लिख दिया है जिसे मिटाना मुमकिन नहीं होगा।


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