"मैं नदी हूँ, सैलाब बनकर लौटूंगा": राघव चड्ढा ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ फूंका बिगुल!
कहते हैं कि राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही दुश्मन, बस होते हैं तो सिर्फ समीकरण। कल तक जो चेहरा आम आदमी पार्टी का सबसे चमकता सितारा था, आज वही चेहरा पार्टी की आंखों की किरकिरी बन गया है। जी हां हम बात कर रहे हैं राघव चड्ढा की। जिन्हें राज्यसभा में उपनेता पद से हटाकर मानो उनकी राजनीतिक जुबान पर ताला जड़ने की कोशिश की गई है। लेकिन राघव ने भी साफ कर दिया है कि वह 'नदी' हैं, जो वक्त आने पर 'सैलाब' बन जाएगी। आखिर क्यों केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार आज अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं? क्या यह समोसे और रिचार्ज की लड़ाई है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा सियासी खेल छिपा है? देखिए हमारी इस खास रिपोर्ट में!
दरअसल, पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा ने एक वीडियो जारी कर सीधा हमला बोला। उन्होंने बेहद भावुक लेकिन सख्त लहजे में कहा कि वह आम आदमी की आवाज बनकर संसद पहुंचे थे। उन्होंने सवाल दागा कि "क्या जनता के मुद्दे उठाना अपराध है? मैंने जोमैटो-ब्लिंकिट के राइडर्स, महंगे समोसे, मोबाइल रिचार्ज और मिडिल क्लास के टैक्स की बात की, तो इससे पार्टी को क्या नुकसान हुआ?" राघव ने आरोप लगाया कि पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को बकायदा पत्र लिखकर उन्हें बोलने से रोकने की साजिश रची है। राघव ने चेतावनी देते हुए कहा कि "मेरी खामोशी को हार मत समझना, मैं सैलाब बनकर लौटूंगा।
वहीं पार्टी ने भी राघव के आरोपों पर पलटवार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राष्ट्रीय प्रवक्ता अनुराग ढांडा ने सीधा निशाना साधते हुए कहा कि जब संसद में पार्टी को देश बचाने के लिए संघर्ष करना चाहिए, तब राघव 'एयरपोर्ट की कैंटीन में समोसे सस्ते' कराने की रील बना रहे थे। पार्टी का सबसे बड़ा आरोप यह है कि राघव ने टीएमसी के महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और वह पार्टी के संसदीय एजेंडे के बजाय अपनी 'पर्सनल ब्रांडिंग' में जुटे थे। ढांडा ने तो यहां तक कह दिया, "तुम मोदी से डर गए हो राघव, जो डर जाए वो देश के लिए क्या लड़ेगा?"
आपको बता दें राघव चड्ढा का AAP में ग्राफ जितनी तेजी से ऊपर गया था, उतनी ही तेजी के साथ नीचे गिरा है। इसके पीछे कई बड़े कारण माने जा रहे हैं। जैसे जब अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जेल में थे, तब राघव लंबे समय तक UK में थे। पार्टी के 'कट्टर' समर्थकों ने सवाल उठाए कि जब जहाज डूब रहा था, तब कैप्टन का सबसे खास सिपाही कहां था? वहीं फरवरी 2025 के दिल्ली चुनाव में राघव को मतदाता सूची की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। साथ ही केजरीवाल की रिहाई और शराब घोटाले में नेताओं के बरी होने पर राघव की ओर से कोई उत्साहजनक प्रतिक्रिया न आना, पार्टी नेतृत्व को खटक गया। और बजट सत्र के दौरान विपक्षी एकता के महत्वपूर्ण प्रस्तावों से दूरी बनाना उनके खिलाफ आखिरी कील साबित हुआ। आपको बता दें संसद के पिछले 2 सत्रों में राघ चड्ढा ने कई मुद्दें उठाए। जैसे 2025 के शीतकालीन सत्र में...
ब्लिंकिट, जोमैटो और स्विगी जैसे डिलीवरी पार्टनर्स के कम वेतन, 10-मिनट डिलीवरी का मुद्दा
कॉपीराइट एक्ट 1957 में संशोधन की मांग की
'एक देश, एक स्वास्थ्य उपचार' की वकालत की और सरकारी अस्पतालों की बदहाली पर चिंता
वहीं 2026 के बजट सत्र में जिन मुद्दों को राघव चड्ढा ने सदन में जोर-सोर से उठाया, उनमें...
यूरिया और अन्य मिलावटों का मुद्दा उठाया।
150 से ज्यादा एयरपोर्ट्स के डिपार्चर एरिया में किफायती कैफे की मांग।
मोबाइल रीचार्ज 28 दिन के बजाय पूरे 30 दिन करने और बचा हुआ डेटा अगले महीने जुड़ने की मांग
मिनिमम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने को पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव
विवाहित जोड़ों के लिए एक साथ इनकम टैक्स फाइलिंग का विकल्प दिया जाए
भारत में पितृत्व अवकाश को एक कानूनी अधिकार बनाने की मांग
वहीं अब राघव की जगह पंजाब के ही सांसद अशोक मित्तल को उपनेता बनाया गया है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इसे सामान्य प्रक्रिया बताते हुए कहा कि "पार्टी की नीतियां चलती रहती हैं।" हालांकि, कहा जा रहा है कि यह पंजाब के उन नेताओं को भी संदेश है जो दिल्ली हाईकमान से ऊपर जाने की कोशिश करते हैं। राघव, जो कभी पंजाब में दिल्ली के 'सुपर सीएम' की तरह देखे जाते थे, आज वहां के समीकरणों से भी पूरी तरह बाहर हो चुके हैं।
कुल मिलाकर राघव चड्ढा और आम आदमी पार्टी के बीच के सारे पुल अब टूट चुके हैं। '5 फिरोजशाह रोड' यानी केजरीवाल के बंगले के दरवाजे अब राघव के लिए बंद नजर आ रहे हैं। लुटियंस दिल्ली में अब बस एक ही चर्चा है कि क्या राघव चड्ढा पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले पाला बदलेंगे? क्या वह बीजेपी का दामन थामेंगे या फिर अपनी अलग राह चुनेंगे? चड्ढा भले ही खुद को 'नदी' कह रहे हों, लेकिन राजनीति की इस बिसात पर वह फिलहाल अकेले पड़ गए हैं। अब देखना यह होगा कि राघव का यह 'सैलाब' पार्टी को डुबोएगा या वह खुद राजनीति की लहरों में कहीं खो जाएंगे।


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