छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के अधिकारी संजीव तिवारी की 25 साल से एक ही कार्यालय में पदस्थापना पर गंभीर आरोप
रायपुर - छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग से जुड़े अधिकारी संजीव तिवारी की लंबे समय से एक ही कार्यालय में पदस्थापना और उनके कार्यकाल से जुड़े टेंडर, विज्ञापन तथा अन्य प्रशासनिक मामलों को लेकर लगातार शिकायतें और ज्ञापन सामने आने के बाद अब विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों में संजीव तिवारी का उल्लेख अपर संचालक, जनसंपर्क संचालनालय के रूप में मिलता है। वर्ष 2022 के आधिकारिक कार्यालयी दस्तावेज में भी उनका यही पदनाम दर्ज है। 25 वर्ष से अधिक समय से एक ही कार्यालय में पदस्थापना का मामला शिकायतकर्ता की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों में आरोप लगाया गया है कि संजीव तिवारी लंबे समय से, लगभग 25 वर्ष से अधिक अवधि से जनसंपर्क विभाग, संबंधित कार्यालय में पदस्थ हैं और पिछले कई वर्षों से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं।
इतनी लंबी अवधि तक एक ही कार्यालय में पदस्थ रहने को लेकर पहले भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि लगातार एक ही स्थान पर लंबे समय तक पदस्थ रहने से विभागीय कार्यों, विज्ञापन वितरण, टेंडर प्रक्रिया तथा प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता की स्वतंत्र जांच आवश्यक हो जाती है। टेंडर और विज्ञापन मामलों को लेकर गंभीर शिकायतें संजीव तिवारी के कार्यकाल से संबंधित टेंडर, विज्ञापन आवंटन और विभागीय आर्थिक गतिविधियों को लेकर पूर्व में भी शिकायतें एवं ज्ञापन प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन मामलों में नियमों एवं पारदर्शिता से संबंधित कई सवाल उठते हैं और शिकायतों के बावजूद अपेक्षित स्तर पर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जनसंपर्क विभाग सरकारी विज्ञापन, मीडिया से संबंधित कार्यों और विभिन्न प्रचार-प्रसार गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे विभाग में विज्ञापन एवं टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता सीधे तौर पर सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ी होती है। पूर्व में संभाग आयुक्त को भी दिया गया था ज्ञापन उपलब्ध जानकारी के अनुसार संजीव तिवारी के विरुद्ध पूर्व में संभाग आयुक्त के समक्ष शिकायत एवं ज्ञापन प्रस्तुत किया जा चुका है। इसके बाद भी वर्तमान समय में अलग-अलग विषयों को लेकर कई शिकायतें की गई हैं। शिकायतों में उठाए गए बिंदुओं की जांच विभिन्न स्तरों पर की जा रही है, लेकिन जांच की प्रक्रिया और उसके निष्कर्ष को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता दिखाई नहीं दे रही है। सबसे बड़ा सवाल—शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं? इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी अधिकारी की लंबे समय की पदस्थापना, टेंडर, विज्ञापन तथा अन्य विभागीय कार्यों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं और जांच के लिए दस्तावेज भी उपलब्ध कराए गए हैं, तो अब तक जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं हुई? शिकायतकर्ता ने आयुक्त जनसंपर्क, सचिव स्तर तथा राज्य सरकार से मामले में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक वजह है जिसके चलते इतने लंबे समय से एक ही कार्यालय में पदस्थ अधिकारी के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं हो पा रही है। विभागीय प्रतिवेदन ने बढ़ाए सवाल मामले में सबसे गंभीर पहलू वह विभागीय प्रतिवेदन बताया जा रहा है, जिसे शिकायतकर्ता ने अपने आरोपों के समर्थन में प्रस्तुत किया है। विभागीय प्रतिवेदन में सामने आए तथ्यों से उन मामलों पर पर्दा डालने की स्थिति दिखाई देती है, जिनमें संजीव तिवारी की भूमिका और विभागीय निर्णयों की जांच की मांग की गई है। यदि विभागीय रिकॉर्ड में शिकायतों से जुड़े तथ्य उपलब्ध हैं, तो उन सभी दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच कर यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि संबंधित मामलों में नियमों का पालन हुआ था या नहीं और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की है। जांच आयोग, समिति की जांच पर भी नजर शिकायतकर्ता के अनुसार वर्तमान में विभिन्न शिकायतों और दस्तावेजों के आधार पर जांच की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में अब जांच एजेंसी अथवा विभागीय जांच समिति की रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी। जांच में विशेष रूप से यह देखा जाना चाहिए कि - लंबे समय तक एक ही कार्यालय में पदस्थापना किन प्रशासनिक आदेशों के आधार पर हुई। - विज्ञापन आवंटन की प्रक्रिया में कौन-कौन से नियम लागू थे। - सरकारी विज्ञापनों के चयन और वितरण का रिकॉर्ड क्या है। - संबंधित टेंडर किन नियमों के तहत जारी किए गए। - टेंडर एवं विज्ञापन प्रक्रिया में अधिकारियों की भूमिका क्या रही। - शिकायतों के बाद विभाग द्वारा क्या कार्रवाई की गई। - जांच में सामने आए तथ्यों पर अब तक क्या निर्णय लिया गया। - यदि किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध अथवा नियमविरुद्ध पाई जाती है तो जिम्मेदारी क्यों निर्धारित नहीं की गई। सरकार से स्वतंत्र जांच की मांग मामला केवल किसी एक अधिकारी के विरुद्ध शिकायत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी विज्ञापन एवं टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा विषय है। इसलिए मांग की गई है कि मामले की जांच उसी विभाग के अधिकारियों के बजाय किसी स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच एजेंसी अथवा सक्षम समिति से कराई जाए और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। मुख्यमंत्री और उच्च अधिकारियों की भूमिका पर सवाल जनसंपर्क विभाग के सचिव तथा आयुक्त जनसंपर्क से सवाल किया है कि जब संजीव तिवारी की पदस्थापना, विभागीय कार्यप्रणाली और टेंडर-विज्ञापन से संबंधित शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो मामले में स्पष्ट निर्णय कब लिया जाएगा? दस्तावेज में दर्ज तथ्यों की निष्पक्ष जांच और दोषी पाए जाने वाले किसी भी अधिकारी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई ही पूरे मामले में पारदर्शिता स्थापित कर सकती है। फिलहाल इस प्रकरण में जांच की अंतिम रिपोर्ट और सक्षम प्राधिकारी का निर्णय सामने आना बाकी है। इसलिए अब निगाह इस बात पर है कि उपलब्ध शिकायतों एवं विभागीय दस्तावेजों की जांच के बाद सरकार क्या कार्रवाई करती है।
रिपोर्टर - मज़हर इकबाल

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