धर्मादा के नाम पर 'घोटाला': श्रीगंगानगर अग्रोहा विकास ट्रस्ट में मचा घमासान, लाखों के गबन के आरोप

श्रीगंगानगर :  समाज सेवा और विकास के नाम पर बने 'श्रीगंगानगर अग्रोहा विकास ट्रस्ट' में इन दिनों सेवा नहीं, बल्कि 'सियासत और घोटाले' की गूँज सुनाई दे रही है। ट्रस्ट के भीतर मचे आंतरिक कलह ने अब सार्वजनिक रूप ले लिया है, जिसमें लाखों रुपये की हेराफेरी और ट्रस्ट की संपत्तियों को खुर्द-बुर्द करने के गंभीर आरोप सामने आए हैं।

 सच बोलने पर 'एग्जिट': संस्थापक सदस्य को ही दिखाया बाहर का रास्ता 

मामले का खुलासा तब हुआ जब ट्रस्ट के संस्थापक सदस्य राजदीप टाटिया ने हिसाब-किताब में पारदर्शिता की मांग उठाई। सूत्रों के अनुसार, जब उन्होंने गबन का मुद्दा उठाया, तो उन्हें शांत करने के लिए 'सचिव' पद का लालच दिया गया। टाटिया ने जब इस 'ऑफर' को ठुकरा कर ईमानदारी का रास्ता चुना, तो उन्हें ट्रस्ट के आधिकारिक ग्रुप से बाहर निकाल दिया गया। सवाल यह उठता है कि क्या सच पूछना इतना बड़ा अपराध हो गया कि संस्थापक सदस्य को ही दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका गया?

 स्वर्गीय हरपत राय टाटिया की 'अमानत' पर वर्तमान पदाधिकारियों की टेढ़ी नजर?
ट्रस्ट के पूर्व सचिव स्वर्गीय श्री हरपत राय टाटिया ने जीते-जी समाज के मेधावी बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए अपनी मेहनत और समाज के सहयोग से 7 से 10 लाख रुपये की एफडी (FD) करवाई थी। उनका उद्देश्य था कि इस राशि से बच्चों को प्रोत्साहित किया जाए। लेकिन उनके निधन के बाद, वर्तमान जिम्मेदार इस 'अमानत' को डकारते जा रहे है। खबर है कि इस एफडी को बिना किसी ठोस कारण या समाज की अनुमति के तोड़ दिया गया है। आज न तो उस पैसे का हिसाब है और न ही उन बच्चों के भविष्य की चिंता। आखिर समाज की गाढ़ी कमाई का यह पैसा किसकी जेब में गया?

 ट्रस्ट की बिल्डिंग बेचने की साजिश और तालेबंदी 

इतना ही नहीं, ट्रस्ट की कीमती बिल्डिंग पर भी भू-माफियाओं जैसी नजरें गढ़ी हुई हैं। आरोप है कि पदाधिकारी इस बिल्डिंग को बेचकर निजी लाभ कमाने की योजना बना रहे हैं। वर्तमान में बिल्डिंग पर ताला लगा दिया गया है, जो इस बात का प्रतीक है कि ट्रस्ट अब समाज के लिए नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा लोगों की 'जागीर' बन चुका है। मनमाने तरीके से किसी को भी रहने या किराए पर दिया जा रहा है। जिसका पैसा कहा जा रहा है, किसी को नहीं पता।

 समाज मांग रहा जवाब 

2024 में प्राप्त चंदे का कोई हिसाब नहीं है, जो प्राप्त पैसे का हिसाब नहीं दे पा रहा उससे सस्पेंस में डालने का प्रस्ताव कुछ लोगों ने आपसी मीटिंग कर पारित कर दिया। जब-जब हिसाब की बात आती है, तब-तब 'अन्नाकानी' और टालमटोल का खेल शुरू हो जाता है। समाज के प्रबुद्ध जनों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है। लोग पूछ रहे हैं:

 स्वर्गीय टाटिया जी द्वारा समाज सहयोग से बच्चों के लिए छोड़ी गई 7-10 लाख की एफडी कहाँ गई? 

2022-23, ओर 2023-2024 का हिसाब बार बार मांगने पर भी अभी तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा

 बिना आम सहमति के ट्रस्ट की संपत्ति बेचने का अधिकार किसने दिया? 

 पारदर्शिता मांगने वाले सदस्यों को अपमानित कर बाहर क्यों निकाला जा रहा है?

रिपोर्टर : नरेश गर्ग 

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.