न्यायालय के आदेशों की अवहेलना और अधिकारियों की मनमानी के विरुद्ध आक्रोश
राजगढ़ : के शिक्षा विभाग में वर्षों से अपनी सेवाएँ देने वाले -औपचारिक शिक्षा केंद्रों के अनुदेशकों ने विभाग के आला अधिकारियों पर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने और माननीय न्यायालय के आदेशों का मज़ाक उड़ाने का गंभीर आरोप लगाया है।संघर्ष के 17 साल और 'शून्य' उपलब्धि सन 1990 में प्रदेश सरकार द्वारा खोले गए गैर-औपचारिक केंद्रों में कार्यरत अनुदेशकों को उम्मीद थी कि उन्हें प्राथमिक शिक्षक (सहायक अध्यापक) के समकक्ष पद और वेतनमान दिया जाएगा। लेकिन विभागीय अधिकारियों के "अड़ियल और तानाशाही रवैये" के कारण इन शिक्षित युवाओं के जीवन के 17 बहुमूल्य वर्ष बर्बाद हो गए।
अधिकारियों की मनमानी और वेतन विसंगति
तथा वहीं न्यायालय की अवमानना: माननीय न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, अधिकारियों ने स्वेच्छाचारी नीति अपनाते हुए अनुदेशकों को 'संविदा' के पद पर धकेल दिया।
न्यूनतम मानदेय: महंगाई के इस दौर में मात्र ₹5,000 का वेतन देना न केवल अमानवीय है, बल्कि यह सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों और मानवता का हनन है।
दोहरा मापदंड: स्मिता श्रीवास्तव के प्रकरण के समान भर्ती प्रक्रिया अपनाने के बावजूद, अनुदेशकों को सहायक अध्यापक का पद और उचित वेतनमान देने से वंचित रखा गया है।
सेवानिवृत्ति के करीब, पर घर चलाना मुश्किल वर्तमान में स्थिति यह है कि कई शिक्षकों की सेवा के मात्र 1 से 2 वर्ष ही शेष बचे हैं। अधिकारियों की हठधर्मिता के कारण यह शिक्षक आज अपने परिवार का भरण-पोषण करने में भी असमर्थ हैं। बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े इन गुरुजनों के पास न तो आर्थिक सुरक्षा है और न ही वह सम्मान, जिसके वे हकदार थे।"यह सिर्फ वेतन की लड़ाई नहीं है, यह हमारे स्वाभिमान और जीवन के उन 17 सालों की कीमत है जो हमने व्यवस्था की भेंट चढ़ा दिए
रिपोर्टर : जावेद


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