तूने किसका लिया हे वेश ! कौन चला रहा हे यह देश?!
तूने किसका लिया हे वेश !
कौन चला रहा हे यह देश?!
यह देश कौन चला रहा है?
यह सवाल आज के समय में केवल एक जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक गहरा चिंतन है। हर गली, हर चौपाल, हर सोशल मीडिया बहस में यह प्रश्न गूंजता है—आखिर देश को चला कौन रहा है? क्या कोई एक व्यक्ति? क्या कोई एक पार्टी? या फिर इसके पीछे कोई और ही सच्चाई छुपी है?
अक्सर हम अपनी भावनाओं, अपने झुकाव और अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर इस सवाल का जवाब दे देते हैं। कोई कहता है—प्रधानमंत्री चला रहे हैं, कोई कहता है—सरकार चला रही है, तो कोई कहता है—एक खास विचारधारा देश को दिशा दे रही है।
लेकिन अगर हम थोड़ा ठहरकर, बिना पूर्वाग्रह के इस सवाल को समझने की कोशिश करें, तो तस्वीर कहीं ज्यादा व्यापक और गहरी नजर आती है।
कर्म से देखें तो
देश एक व्यवस्थित तंत्र से चलता है। यह तंत्र केवल नेताओं का नहीं, बल्कि हजारों-लाखों अधिकारियों, कर्मचारियों, सैनिकों, न्यायाधीशों और संस्थाओं का समुच्चय है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री और सचिव इस तंत्र के महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन वे पूरे सिस्टम नहीं हैं। देश संविधान के नियमों पर चलता है, नीतियों के ढांचे पर चलता है और जिम्मेदारियों के संतुलन पर चलता है। अगर सिस्टम मजबूत है, पारदर्शी है और जवाबदेह है—तो देश सही दिशा में बढ़ता है। लेकिन अगर यही सिस्टम कमजोर, पक्षपाती या भ्रष्ट हो जाए, तो सबसे बड़े नेता भी देश को सही रास्ते पर नहीं रख सकते।
मर्म से देखें तो
देश की असली शक्ति उसके लोग हैं। जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है, बल्कि देश की आत्मा है। लोगों की सोच, उनकी समझ,उनका व्यवहार और उनकी जागरूकता—यही तय करती है कि देश किस दिशा में जाएगा। अगर जनता सवाल पूछती है,सही जानकारी ढूंढती है, और अपने अधिकारों व कर्तव्यों को समझती है—तो लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन अगर वही जनता अफवाहों, अंधविश्वास या अंधभक्ति में बह जाती है, तो धीरे-धीरे देश की नींव कमजोर होने लगती है। इतिहास गवाह है कि कोई भी देश केवल शासकों से महान नहीं बनता, बल्कि जागरूक नागरिकों से बनता है।
धर्म से देखें तो
भारत केवल एक भूगोल नहीं है, यह एक जीवंत संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना है। यहाँ मर्यादा के प्रतीक राम हैं, कर्मयोग के प्रेरक कृष्ण हैं, करुणा के संदेशवाहक बुद्ध हैं, अहिंसा के मार्गदर्शक महावीर हैं, और साथ ही अल्लाह, ईसा मसीह और अनेक आस्थाओं का सम्मान है। यह देश विविधताओं में एकता का प्रतीक है, जहाँ अलग-अलग मान्यताओं के बावजूद एक साझा भावना है—मानवता की।
सच्चा धर्म कभी विभाजन नहीं करता, बल्कि जोड़ता है।
वह हमें सिखाता है कि न्याय क्या है, सत्य क्या है और सही मार्ग कौन सा है।
तो फिर निष्कर्ष क्या है?
सच्चाई यह है कि यह देश किसी एक व्यक्ति, किसी एक पार्टी या किसी एक विचारधारा की जागीर नहीं है।
यह देश तीन आधारों पर खड़ा है—*कर्म, मर्म और धर्म*।
जब कर्म (व्यवस्था) ईमानदार और मजबूत होती है,
जब मर्म (जनता) जागरूक और जिम्मेदार होती है,
और जब धर्म (मूल्य और नैतिकता) सच्चे और संतुलित होते हैं—
तभी एक राष्ट्र शक्तिशाली, समृद्ध और स्थिर बनता है।
लेकिन जैसे ही इन तीनों में से कोई एक भी कमजोर पड़ता है, देश की दिशा डगमगाने लगती है।
इसलिए यह समझना बेहद जरूरी है कि देश चलाना केवल नेताओं का काम नहीं है।
यह जिम्मेदारी हर नागरिक की है—हमारी सोच में, हमारे व्यवहार में और हमारे निर्णयों में।
अंत में...
जब अगली बार यह सवाल उठे—“यह देश कौन चला रहा है?” तो जवाब किसी एक नाम में नहीं, बल्कि एक भावना में होना चाहिए। और हमें यह ख्याल रखना हे कि हम जोभी निर्णय ले वह कोई व्यक्ति विशेष को ध्यान में न रखे पर देश और अपने धर्म और कर्म को ध्यान में रखे। क्योंकि देश तो कोई भी चला लेगा लेकिन हमारे धर्म , कर्म और मर्म को हमे ही ध्यान में रखना हे।
“यह देश हम सब मिलकर चला रहे हैं।” और जब तक हम हे तब तक देश की आबादी और बरबादी में हमारा कही न कही हाथ हे वह हमे अपने आप में जाक के देखना हे।
यही लोकतंत्र की आत्मा है,
और यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
जय हिन्द।।
लेखक :- प्रतिक संघवी

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