करोड़ों का चढ़ावा, किसके पास जाती है रकम? जानिए मंदिरों की पूरी व्यवस्था
अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला क्या सामने आया, पूरे देश के सनातनी और करोड़ों श्रद्धालुओं के दिल को ऐसी ठेस पहुंची कि अब हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है। सवाल ये कि आखिर हमारे देश के बड़े-बड़े मंदिरों में जो हर साल करोड़ों-अरबों रुपयों का चढ़ावा आता है, उसका होता क्या है? भारत के कोने-कोने में ऐसे कई सिद्ध मंदिर हैं जहां हर दिन नोटों की गड्डियां, सोने के बिस्कुट, चांदी के छत्र और कीमती आभूषण दानपात्रों में बरसते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस महा-चढ़ावे की निगरानी कौन करता है? क्या यह पैसा सीधे सरकार के पास जाता है या किसी ट्रस्ट की तिजोरी में?
राम मंदिर के ताजा विवाद ने इस सोई हुई बहस में फिर से ऐसी आग लगा दी है कि अब लोग मंदिरों के वित्तीय प्रबंधन और उनके गबन को रोकने वाले कानूनों को खंगालने लगे हैं। आपको बता दें बड़े मंदिरों में चढ़ावे के रखरखाव के लिए एक बेहद सख्त और तय प्रक्रिया होती है। जब भी किसी बड़े मंदिर का दानपात्र खोला जाता है, तो वहां मंदिर ट्रस्ट के बड़े अधिकारी, बैंक के कर्मचारी और कई बार प्रशासनिक अधिकारी खुद मौजूद होते हैं। यह पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होती है। नोटों की गड्डियों को गिनने के लिए बकायदा मशीनें लगाई जाती हैं और उसे तुरंत बैंक में जमा कराया जाता है।
वहीं, अगर किसी श्रद्धालु ने सोना, चांदी या कोई कीमती हीरा-जवाहरात चढ़ाया है, तो उसका वजन करके एक अलग सरकारी रिकॉर्ड या स्टॉक रजिस्टर तैयार किया जाता है। हर वित्तीय वर्ष के अंत में चार्टर्ड अकाउंटेंट के जरिए इस पूरे खजाने का ऑडिट कराया जाता है, ताकि आय और खर्च का हिसाब शीशे की तरह साफ रहे। धार्मिक ट्रस्टों के नियमों के मुताबिक, इस चढ़ावे का इस्तेमाल कई जगहों पर किया जाता है। जैसे मंदिर के विशाल परिसरों की सफाई, सुरक्षा, बिजली और जीर्णोद्धार का खर्च इसी पैसे से निकलता है। भगवान के दैनिक श्रृंगार, छप्पन भोग, महा-आरती और त्योहारों पर होने वाले भव्य आयोजनों में यह राशि लगती है। मंदिर के मुख्य पुजारियों से लेकर सेवादारों, सुरक्षाकर्मियों और सफाईकर्मियों का वेतन इसी चढ़ावे से दिया जाता है। वहीं दूर-दूर से आने वाले भक्तों के लिए मुफ्त लंगर, ठहरने के लिए धर्मशालाएं, पीने का पानी और मेडिकल सुविधाएं मुहैया कराने में भारी खर्च होता है। वहीं कई बड़े मंदिर ट्रस्ट जैसे तिरुपति या शिरडी इस पैसे से बड़े-बड़े मुफ्त अस्पताल, अनाथालय, स्कूल और यूनिवर्सिटी चलाते हैं।
आपको बता दें यह पूरा मामला देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। देश में लंबे समय से यह मांग उठ रही है कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए। इस पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना रुख बिल्कुल साफ करते हुए कहा है कि वह मंदिरों पर किसी भी तरह के सरकारी नियंत्रण के पक्ष में नहीं है।
देखा जाए तो मंदिरों का चढ़ावा सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों का भगवान के प्रति अटूट विश्वास है। जब राम मंदिर जैसे पावन स्थान से चंदा चोरी जैसी खबरें आती हैं, तो वो विश्वास डगमगाता है। कानून अपनी जगह हैं, ऑडिट अपनी जगह है और सरकार का रुख अपनी जगह, लेकिन डिजिटल इंडिया के इस दौर में अब वक्त आ गया है कि मंदिरों के इस महा-चढ़ावे के प्रबंधन में पूरी पारदर्शिता लाई जाए। जब तक हर एक पैसे का हिसाब ऑनलाइन और सार्वजनिक नहीं होगा, तब तक ऐसी उंगलियां उठती रहेंगी। अब देखना यह है कि राम मंदिर के इस बड़े सबक के बाद देश के अन्य बड़े मंदिर प्रशासन अपनी तिजोरियों की सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए क्या नया और कड़ा कदम उठाते हैं!
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