रामप्रकाश गुप्ता: उत्तर प्रदेश के सबसे भुलक्कड़ मुख्यमंत्री की कहानी

राजनीति को अनंत संभावनाओं का खेल कहा जाता है, जहाँ कभी-कभी अप्रत्याशित नेता सामने आ जाते हैं। उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही एक नेता था — रामप्रकाश गुप्ता, जिन्हें उनके कार्यकाल के दौरान भूलने की आदतों के लिए जाना जाता था। 12 नवंबर 1999 को बीजेपी ने 76 वर्षीय रामप्रकाश गुप्ता को यूपी का 19वां मुख्यमंत्री बनाया, जो राजनीति के डार्क हॉर्स कहे जा सकते हैं।

गुप्ता का राजनीतिक सफर लंबा और संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने 1967 में चौधरी चरण सिंह की सरकार में यूपी के पहले उपमुख्यमंत्री के रूप में सेवा दी। लेकिन 15 साल तक वे राजनीति से दूर रहे और फिर अचानक 1999 में मुख्यमंत्री के पद पर आ गए। उनके कार्यकाल में कई अफसरों के ट्रांसफर हुए, लेकिन उनकी भूलने की आदतें और सख्त राजनीतिक परिस्थितियाँ अक्सर चर्चा में रहीं।

रामप्रकाश गुप्ता की भूलने की आदतें इतनी मशहूर थीं कि मंच पर भाषण याद दिलाने के बाद भी वे अपनी बात भूल जाते थे। कई बार तो वे अपने मंत्रियों के नाम भी भूल जाते थे। उनके इस स्वाभाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई किस्से और चुटकुले मशहूर हुए। बावजूद इसके, उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भाजपा की सफलता में योगदान दिया।

उनका जन्म 26 अक्टूबर 1924 को झांसी जिले में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट रहे गुप्ता ने आरएसएस और बीजेपी से जुड़कर अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया। 1975 में आपातकाल के दौरान वे पहले सत्याग्रही जेल जाने वाले नेता बने। अपने जीवन के अंत में वे मध्य प्रदेश के राज्यपाल भी रहे।

रामप्रकाश गुप्ता का नाम भारतीय राजनीति में एक अलग पहचान के रूप में दर्ज है, जो बताता है कि राजनीति में किस्मत, अवसर और नेतृत्व कौशल का संगम कितना महत्वपूर्ण होता है। भले ही वे भूलने के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत आज भी कई नेताओं के लिए प्रेरणा है।

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