जब समय निकल जाए तब सब व्यर्थ – कोई अर्थ नहीं
जीवन में हर सुख, संबंध और अवसर का वास्तविक महत्व तभी है, जब वह सही समय पर मिले। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविता "कोई अर्थ नहीं" इसी गहन जीवन-सत्य को मार्मिक शब्दों में व्यक्त करती है। आइए, समय, संवेदना और संबंधों का महत्व बताती इस प्रेरक कविता का आनंद लेते हैं —
कोई अर्थ नहीं......
नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ,
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
मन कटुवाणी से आहत हो
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
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