यह कहानी केवल दूध और घी के व्यापार की नहीं है, बल्कि यह उन तीन महिलाओं के अटूट विश्वास, नारी शक्ति और ग्रामीण भारत के बदलते स्वरूप की मिसाल है।

रामगढ़ : झारखंड राज्य के रामगढ जिले के मांडू प्रखंड अंतर्गत रतवे गाँव आज डेयरी फार्मिंग के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश कर रहा है। यहाँ की मिट्टी में अब फसलों के साथ-साथ गौ-पालन से आई समृ‌द्धि की महक भी झलकती है। सोनी देवी, बबिता देवी और सुनीता देवी ने अपनी मेहनत और उन्नत नस्ल की गायों के मेल से सफलता की जो इबारत लिखी है, वह काबिले तारीफ है। आज ये तीन महिलाएँ केवल पशुपालक ही नहीं, बल्कि वे एक ऐसे आर्थिक आंदोलन का नेतृत्व कर रही हैं जिसने रतवे गाँव की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल दी है।" समूह में जुड़ने से पहले की बात करे, तो रतवे गाँव की इन तीनों दीदियों का जीवन बहुत ही साधारण और संघर्षपूर्ण था। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि हर छोटी ज़रूरत के लिए उन्हें काफी सोच-विचार करना पड़ता था। ग्रामीण परिवेश में अक्सर महिलाओं की भूमिका घर के काम-काज और बच्चों की देखभाल तक ही सीमित मान ली जाती है, लेकिन सोनी, बबिता और सुनीता के अन्दर कुछ और ही चल रहा था। उनके मन में अपने परिवार को एक बेहतर जीवन देने की तड़प थी और खुद की एक अलग पहचान बनाने की जिद। वे जानती थीं कि अगर स्थिति बदलनी है, तो उन्हें खुद ही पहल करनी होगी। इसी छटपटाहट ने उन्हें एक साथ आने और कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया।

उनकी सफलता की पहली सीढ़ी थी झारखण्ड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) के द्वारा दिनांक 31-12-2016 को गठित 'सरस्वती महिला समूह'। इस समूह से जुड़ने के बाद उन्हें यह समझ में आया कि अकेले लड़ने से बेहतर है मिलकर लड़ें। समूह से जुड़ना केवल बचत का माध्यम नहीं है, बल्कि यह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाने वाला एक मजबूत मंच है। नियमित बैठकों में उपस्थित होकर 20 रूपये बचत करने लगी, आपसी सहयोग ने समूह से जुड़ी दीदियों के अन्दर कुछ नया करने का आत्मविश्वास पैदा किया। इस आत्मविश्वास के साथ डेयरी व्यवसाय में उतरने का फैसला लिया। शुरुआत बहुत ही चुनौतीपूर्ण थी। उनके पास केवल दो साहिवाल नस्ल की गायें थीं। संसाधनों की कमी थी, पशुपालन का कोई वैज्ञानिक अनुभव नहीं था और ऊपर से समाज की वो पुरानी सोच, जो अक्सर महिलाओं के व्यवसाय करने पर सवाल उठाती है। लेकिन इन तीनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और तय किया कि वे पीछे मुड़कर नहीं देखेंगी। वे खुद गार्यों की सेवा करतीं, उनके चारे का प्रबंध करर्ती और दूध की शुद्धता का पूरा ध्यान रखतीं।
जैसे-जैसे समय बीता, उनके काम में विस्तार होने लगा। यहाँ झारखंड स्टेट लिवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही। जेएसएलपीएस और रतवे क्लस्टर के मार्गदर्शन ने उन्हें पेशेवर नजरिया दिया। उन्हें यह सिखाया गया कि डेयरी को केवल एक घरेलू काम की तरह नहीं, बल्कि एक बिजनेस मॉडल की तरह कैसे चलाया जाए। इन तीनो को बैंक लिंकेज के माध्यम से कुल 1,50,000 रूपया ऋण के रूप में आर्थिक सहारा मिला, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी। इस राशी का उपयोग उन्होंने गायों के लिए बने शेड को विस्तार करने में खर्च किया। अब उनके पास केवल दो गायें नहीं थीं, बल्कि उन्होंने धीरे-धीरे उन्नत नस्लों का एक पूरा फार्म खड़ा कर लिया। आज उनके पास 27 उन्नत नस्ल की गायें हैं, जिनमें गिर, साहिवाल, हरियाणा और रेड सिंधी जैसी नस्लें शामिल हैं। इन गायों की देखरेख वे अपनी संतान की तरह करती हैं, जिससे दूध की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में वृ‌द्धि हुई।
व्यवसाय जब बढ़ने लगा, तो उनके सामने एक बड़ी चुनौती आई-दूध का प्रबंधन। प्रतिदिन 60 से 70 लीटर दूध का उत्पादन तो होने लगा था, लेकिन कभी-कभी बाज़ार में मांग कम होने या दूध बच जाने के कारण नुकसान की स्थिति बन जाती थी। एक साधारण इंसान शायद यहाँ थककर रुक जाता, लेकिन इन दीदियों ने इसे एक अवसर के रूप में देखा। "उन्होंने सोचा कि क्यों न दूध को ही दूसरे उत्पादों में बदला जाए? यहीं से 'वैल्यू एडिशन' (Value Addition) का विचार आया।" उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उ‌द्योग उन्नयन योजना (PMFME) के तहत आवेदन किया और बैंक ऑफ इंडिया से आधुनिक मशीनें खरीदने के लिए 1,50,000 रुपय मिला। अब वे केवल दूध नहीं बेच रही थीं, बल्कि उन्होंने पनीर और शुद्ध देसी घी बनाना भी शुरू कर दिया।
आज रतवे गाँव का यह डेयरी फार्म एक छोटी सी इंडस्ट्री बन चुका है। प्रतिदिन 4 से 5 किलो ताज़ा पनीर तैयार किया जाता है, जिसकी मांग स्थानीय बाज़ारों में इतनी है कि वह इसे पूरा नहीं कर पातीं। वहीं, उनके द्वारा बनाया गया घी 1200 रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है, क्योंकि लोगों को पता है कि यह घी पूरी तरह शुद्ध और पारंपरिक तरीके से बनाया गया है। आज इन तीनो की मासिक आय लगभग 20000 रुपया तक हो जाता है। वार्षिक आय लगभग 8,50,000 रूपया तक हो जाता है इस आय ने उनकी आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। जो महिलाएँ कभी दूसरों की मदद की उम्मीद करती थीं, आज वे अपने परिवारों का मुख्य सहारा हैं और समाज में 'महिला उ‌द्यमी' के तौर पर गर्व से सर उठाकर चलती हैं।
इस पूरी यात्रा का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि इन तीनों महिलाओं ने न केवल अपना जीवन बदला, बल्कि पूरे गाँव की मानसिकता को बदल दिया। आज रतवे की हर बेटी और बहू इन दीदियों को अपना आदर्श मानती है। उनकी सफलता ने यह संदेश दिया है कि सरकारी योजनाओं और व्यक्तिगत मेहनत का अगर सही संगम हो जाए, तो ग्रामीण भारत में भी 'सफ़ेद क्रांति' लाई जा सकती है। सोनी, बबिता और सुनीता की कहानी हमें सिखाती है कि नेतृत्व करने के लिए किसी बड़े शहर या बड़ी डिग्री की ज़रूरत नहीं होती, बस एक दृढ़ संकल्प और साथ मिलकर चलने का जज्बा होना चाहिए। आज वे अपनी सफलता का आनंद ले रही हैं, लेकिन उनका सफर रुका नहीं है, वे अब अन्य महिलाओं को भी इस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर रही हैं, ताकि हर घर आत्मनिर्भर बन सके।

रिपोर्टर : राजीव सिंह

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