रांची Vs जंतर-मंतर! किसका छात्र आंदोलन बना मिसाल?
कहते हैं...जब युवाओं के सपनों पर चोट होती है, तो सड़कों पर सिर्फ भीड़ नहीं उतरती...उतरता है गुस्सा, दर्द और अपने हक की आवाज। दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक को लेकर हुए बड़े आंदोलन के बाद अब देश की नजर एक और छात्र आंदोलन पर टिक गई है...लेकिन इस बार जगह दिल्ली नहीं...बल्कि करीब 1200 किलोमीटर दूर झारखंड की राजधानी रांची है...जहां हजारों छात्र दिन-रात खुले आसमान के नीचे बैठे हैं...हाथों में किताबें हैं...आंखों में नौकरी का सपना है...और जुबान पर सिर्फ एक मांग..."न्याय चाहिए..." रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में छात्र पिछले कई दिनों से डटे हुए हैं। कोई बारिश में भीग रहा है...कोई भूख हड़ताल पर बैठा है...तो कोई अपने भविष्य को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। आंदोलन की अगुवाई कर रहे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है। छात्रों का आरोप है कि झारखंड में सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में लगातार गड़बड़ियां हो रही हैं... मेहनत करने वाले युवाओं के साथ धोखा हो रहा है। लेकिन आपको बता ये रांची का ये छात्र आंदोलन जंतर-मंतर के आनंदोलन से काफी अलग है, कैसे, आइए आपको बताते है अपनी इस खास रिपोर्ट में.....
परीक्षा में धांधली...पेपर लीक के आरोप...OMR शीट में गड़बड़ी...और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग...इन्हीं मुद्दों को लेकर झारखंड की राजधानी रांची में हजारों छात्र सड़कों पर हैं। छात्रों का ये आंदोलन 5 जुलाई 2026 से शुरू हुआ, जब झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC की 14वीं सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट जारी हुआ। रिजल्ट आने के बाद अभ्यर्थियों ने गंभीर आरोप लगाए और देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। दरअसल, छात्रों का आरोप है कि JPSC 14वीं परीक्षा के रिजल्ट में कई सवाल खड़े हुए हैं। पहला आरोप...कटऑफ और मेरिट लिस्ट में पारदर्शिता नहीं बरती गई। छात्रों का कहना है कि मेरिट लिस्ट पर जिम्मेदार अधिकारियों के हस्ताक्षर तक नहीं थे। दूसरा बड़ा आरोप...OMR शीट में हेरफेर का। छात्रों का दावा है कि परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई और कुछ अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाया गया। तीसरा आरोप...परीक्षा कराने वाली एजेंसी TDPL को लेकर है। छात्रों का कहना है कि जिस कंपनी पर पहले सवाल उठ चुके हैं, उसे ही परीक्षा संचालन की जिम्मेदारी क्यों दी गई? और चौथा आरोप सबसे गंभीर है...छात्रों का दावा है कि कुछ लोगों को परीक्षा से पहले प्रश्नों के उत्तर रटवाए गए और परीक्षा में वही सवाल आने का आरोप लगाया गया।
छात्रों का कहना है कि ये सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं है...ये झारखंड के लाखों युवाओं के भविष्य का सवाल है। रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम इस वक्त क्रांति का नया केंद्र बन चुका है। सड़कों पर हजारों छात्र रात-दिन काट रहे हैं। मूसलाधार बारिश हो रही है, सिर पर तिरपाल है, लेकिन इरादे फौलादी हैं! लद्दाख में सोनम वांगचुक की तर्ज पर छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। अन्न-जल त्याग दिया है। मांग सिर्फ एक है कि "परीक्षा में धांधली बंद करो, हमारी मेहनत का हक मत छीनो!" देवेंद्र नाथ महतो का कहना है कि आंदोलन की शुरुआत 5 जुलाई को हुई थी। छात्र नेताओं ने राज्यपाल से मुलाकात की... मुख्यमंत्री से भी अपनी मांगें रखीं...और अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। छात्रों की मांगें भी साफ हैं।
JPSC 14वीं प्रारंभिक परीक्षा को रद्द किया जाए।
पूरे मामले की जांच CID नहीं बल्कि CBI से कराई जाए।
ब्लैकलिस्ट या विवादित कंपनियों को परीक्षा कराने से बाहर किया जाए।
OMR शीट में पांचवां विकल्प यानी "Not Attempted" का ऑप्शन जोड़ा जाए।
कटऑफ और मेरिट लिस्ट पूरी तरह पारदर्शी तरीके से जारी हो।
हालांकि छात्रों के आंदोलन के बाद सरकार ने भी कई कदम उठाए हैं। JPSC अध्यक्ष से लगातार पूछताछ हुई। कई घंटे तक जांच चली। JPSC की 14वीं सिविल सेवा मुख्य परीक्षा समेत कई परीक्षाओं को अगले आदेश तक स्थगित किया गया। CID को जांच की जिम्मेदारी दी गई। और अब तक 11 लोगों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। लेकिन छात्र CID जांच से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्हें निष्पक्ष जांच चाहिए और इसके लिए CBI जांच जरूरी है। वहीं दूसरी तरफ इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यहां छात्र अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं।
अब बात उस तुलना की भी...जिसकी चर्चा सोशल मीडिया पर हो रही है। जी हां अब जरा इस आंदोलन के सबसे बड़े पहलू को समझिए। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जब आंदोलन होते हैं, तो नेशनल मीडिया का हर कैमरा वहां टिक जाता है। लेकिन रांची में 5000 से ज्यादा छात्र जब खुले आसमान नीचे भीग रहे हैं, तो सन्नाटा क्यों है? क्योंकि रांची का यह प्रदर्शन किसी उपद्रव का मोहताज नहीं है! न यहाँ कोई गाली-गलौज है, न कोई अश्लीलता। न यहाँ कोई टुकड़े-टुकड़े गैंग घुसा है, न कोई हिंसा हुई है। न यहाँ पिज्जा पार्टियां चल रही हैं और न ही सुरक्षाबलों के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल हो रहा है। यहाँ सिर्फ भारत का तिरंगा है, हाथों में किताबें और आंखों में अपने हक के लिए बहते आंसू! और भारत माता की जय के नारे। छात्र अनुशासन के साथ प्रशासनिक अनुमतियों का पालन कर रहे हैं, खिचड़ी बनाकर आपस में बांट रहे हैं और शांतिपूर्ण तरीके से न्याय मांग रहे हैं। शायद यही वजह है कि बिना किसी ड्रामे और विवाद के चल रहा यह अनुशासित आंदोलन सोशल मीडिया के एल्गोरिदम और मीडिया की टीआरपी में जगह नहीं बना पा रहा!
ऐसे में सवाल ये है कि.....
क्या हर छात्र आंदोलन का रास्ता एक जैसा होता है?
क्या अपनी मांग रखने के लिए हिंसा जरूरी है?
या फिर रांची के ये छात्र दिखा रहे हैं कि लोकतांत्रिक तरीके से भी अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाई जा सकती है?
रांची के छात्र नेताओं का कहना है कि उनका आंदोलन किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। उनकी लड़ाई सिर्फ भ्रष्टाचार और परीक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर है। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के जंतर-मंतर प्रदर्शन में पुलिस से झड़प, हिंसा और अराजक तत्वों के शामिल होने के आरोप लगे थे। पुलिस का भी दावा था कि छात्रों के बीच कुछ ऐसे लोग घुस गए थे, जिनका मकसद माहौल खराब करना था। कई जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव देखने को मिला था। फिलहाल रांची का ये आंदोलन अभी जारी है। छात्रों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो आने वाले दिनों में आंदोलन और बड़ा किया जाएगा। 6 अगस्त को झारखंड विधानसभा घेराव का ऐलान भी किया गया है। अब देखना होगा सरकार और छात्रों के बीच ये गतिरोध कब खत्म होता है? क्या जांच एजेंसी छात्रों को संतुष्ट कर पाएगी? या फिर रांची का ये सत्याग्रह आने वाले दिनों में एक बड़ा छात्र आंदोलन बन जाएगा?
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