रसखान के काव्य में कृष्ण-प्रेम की अनूठी छटा

भक्त रसखान की रचनाओं में ईश्वर के प्रति प्रेम केवल भक्ति नहीं, बल्कि गहरा आत्मिक समर्पण बनकर सामने आता है। श्रीकृष्ण के रूप, लीलाओं और ब्रजभूमि के प्रति उनका अनुराग उनकी रचनाओं को भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी बनाता है। उनके लिए कृष्ण केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन के सबसे प्रिय भाव थे। तो आइए, जानते हैं रसखान की उन चुनिंदा रचनाओं के बारे में, जिनमें ईश्वर के प्रति उनका अनन्य प्रेम झलकता है - 

प्रेम प्रेम सब कोउ कहै, कठिन प्रेम की फाँस।
प्रान तरफि निकरै नहीं, केवल चलत उसाँस॥

भावार्थ - सब साधक कहते हैं कि हमें "भगवान से प्रेम है, हम तो भगवान के अनन्य प्रेमी हैं", परन्तु प्रेम क्या है, यह कोई नहीं जानता। जो वास्तविक प्रेम करना जानता है, वह संसार के छिन जाने पर भला क्यों रोएगा?

प्रेम हरी को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप।
एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौं सूरज अरु धूप॥

भावार्थ - रसखान प्रेमी भक्त कवि थे। वे प्रेम को हरि का रुप या पर्याय मानते हैं तथा ईश्वर को साक्षात प्रेम स्वरुप मानते हैं।प्रेम एवं परमात्मा में कोई अन्तर नहीं होता जैसे कि सूर्य एवं धूप एक हीं है तथा उनमें कोई तात्विक अन्तर नहीं होता।


प्रेम अगम अनुपम अमित सागर सरिस बखान
जो आबत यहि ढिग बहुरि जात नहीं रसखान।

भावार्थ - रसखान कहते हैं कि प्रेम अगम्य (जिसको जाना न जा सके), अनुपम (जिसकी कोई उपमा न दी जा सके), सागर की भाँति अत्यंत गहरा एवं रसपूर्ण है। जो भी जीव एक बार इस प्रेम-सिंधु के निकट आ जाता है, वह फिर इसे छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाता।


प्रेम फाॅस में फॅसि मरै सोइ जियै सदाहिं
प्रेम मरम जाने बिना मरि कोउ जीवत नाहिं।

भावार्थ -  जो प्रभु के प्रेम के बंधन में बँधकर मर जाता है, वही वास्तव में शाश्वत जीवन (अमरत्व) को प्राप्त करता है। इसके विपरीत, प्रेम के इस गूढ़ रहस्य को जाने बिना, इस संसार में देह मात्र से जीवित रहने वाला व्यक्ति रसिकों की दृष्टि में मृत के समान है। ऐसा जीव मरने के बाद भी शाश्वत चिन्मय जीवन को प्राप्त नहीं कर पाता।


दंपति सुख अरु विषय रस पूजा निष्‍ठा घ्यान
इनतें परे बखानियै शुद्ध प्रेम रसखान।

भावार्थ - रसखान कहते हैं कि दम्पति-सुख (पारिवारिक सुख) और विषय-सुख (इन्द्रियों द्वारा अनुभव किए जाने वाले राग-भोग आदि), तथा पूजा-पाठ और ध्यान-ये सब लौकिक हैं। प्रेम को इन सब से भिन्न जानिए, क्योंकि शुद्ध प्रेम लौकिक नहीं होता।

हरि के सब आधीन पै हरि प्रेम आधीन
याही तें हरि आपुहीं याही बडप्पन दीन।

भावार्थ - यद्यपि समस्त चराचर जगत भगवान श्री हरि के ही अधीन है, परंतु स्वयं श्री हरि प्रेम के अधीन हैं। इसी कारण भगवान ने प्रेम को अपने से भी अधिक बड़ा माना है।

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